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साजिद खान और रेडलाइट जंप का ईश्वरीय न्याय

आम भारतीय सिग्नल के रेड होने के तीन सेकंड बाद तक और ग्रीन होने से तीन सेकंड पहले गाड़ी भगाकर हर सिग्नल पर औसतन तीन बेशकीमती सेकंड बचा लेता है। इस तरह रोजाना तकरीबन 20 सिग्नलों पर तीन-तीन सेकंड बचाकर वह 60 सेकंड सेव कर लेता है। लेकिन जो हमेशा वक्त बचाने की इतनी जल्दी में रहता है,  उस मुल्क के बारे में कहा जाता है कि वह विकसित देशों से 100 साल पीछे है। तो सवाल यह कि इन 100 साल की भरपायी के लिए हमें ट्रैफिक सिग्नल के ग्रीन होने से और कितना पहले अपनी गाड़ी भगानी होगी? रेलवे सफर में आखिरी स्टॉप होने के बावजूद डेढ़ मिनट बचाने की जल्दबाजी में अंकल नीचे बैठी सवारियों पर उनके बैग गिरा देते हैं। पेट्रोल भराते वक्त बगल वाले ड्राइवर के नजर हटने पर मौका पाकर अपनी गाड़ी आगे लगाकर ढाई मिनट बचा लेते हैं। शाम को घर जाते वक्त यही अंकल साइकिल लेन में गाड़ी घुसा पूरे सवा तीन मिनट बचा लेते हैं।

इस तरह के करतब दिखा वह हर महीने आधा घंटा सेव कर लेते हैं। फिर किसी शाम ऐसी ही कुछ रेडलाइटें जंप करके जल्दी घर पहुंचने पर बीवी कहती है कि कई दिनों से फिल्म देखने नहीं गए। ऑप्शन और आईक्यू के मारे अंकल परिवार को गाड़ी में लादकर बगल वाले थिएटर में हिम्मतवाला दिखाने ले जाते हैं। फिल्म खत्म होते ही जैसे-तैसे जान बचाकर घर आते हैं और भारी सांस लेकर कहते हैं, हे भगवान! मेरे तीन घंटे बरबाद हो गए। अगर स्वर्ग या नरक यहीं है,  तो ईश्वर हमारे कुकर्मों का हिसाब भी यहीं करेगा। अक्सर लगता है कि ऊपर वाले ने कुछ लोग इसलिए बनाए हैं,  ताकि उनके जरिये वह हमें गलतियों की सजा दे सके। आप तिल-तिलकर सेकंडों के मिनी भ्रष्टाचार करते रहे और ईश्वर ने शिरीष कुंदरा और साजिद खान जैसों को फिल्में बनाने की छूट दे दी,  ताकि उनकी फिल्मों के जरिये महीनों की मेहनत से बचाए भ्रष्टाचार के एक-एक सेकंड को आप एक झटके में गंवा सकें। अगर आपको लग रहा है कि यह लेख पढ़कर आपने भी तीन मिनट बरबाद कर दिए,  तो याद कीजिए वे दसियों रेडलाइटें,  जो इस हफ्ते आपने जंप की हैं।

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  • Web Title:साजिद खान और रेडलाइट जंप का ईश्वरीय न्याय