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इक्कीस साल बाद

पिछले दिनों जबलपुर जाना हुआ। इस शहर में लगभग इक्कीस साल पहले मैं कुछ समय के लिए रह चुका हूं। मुझे इस शहर की कुछ बातें शुरू से अच्छी लगती रही हैं। नर्मदा के घाट व उनके किनारे की कच्ची हलचल भी। वर्षों पहले वहां जाते ही कुछ समय के लिए मैं एक प्रतिष्ठित परिवार के जिस मकान में रहा,  वह मेरे लिए एक अनजाने आकर्षण का केंद्र रहा। उसमें रह रहे संयुक्त परिवार और उस भवन ने मुझे अक्सर भगवती चरण वर्मा के उपन्यास टेढ़े-मेढ़े रास्ते  की याद दिलाई। इक्कीस साल बाद जब मैं उस जगह गया,  तो मैंने अहाते में एक शानदार कुत्ते के साथ टहलते हुए बच्चे को पाया। बच्चे ने मुझे देखते ही अभिवादन कर कुत्ते को जंजीर से बांधा व गेट खोला। मुख्य द्वार के पास एक बड़ा-सा तोता पिंजरे में था,  जिसने कुछ आवाजें निकालीं।

बच्चे ने ड्रॉइंग रूम में मुझे बैठाकर अपने पिता को बुलाया,  जिनके साथ मैंने चाय पी और नाश्ता किया। इक्कीस साल पहले जब मैं उस घर में पहली बार गया था,  तो लगभग यही नजारा मैंने देखा था। बस इतना-सा अंतर था कि ‘तब’ के पिता की तस्वीर अब माला सहित दीवार पर टंगी थी। तोता उसी पुराने तोते की नस्ल का,  मगर नई उम्र का था। कुत्ता उसी रंग-रूप का, पर जवान था। बच्चा नया व मेरे लिए अनजाना था और पिता में इक्कीस साल पहले के छोटू की हलकी झलक विद्यमान थी। मेरे पास आईना नहीं था,  इसलिए अपने चेहरे की उम्र मेरे सामने नहीं आ पाई, लेकिन गुजरे ‘इक्कीस साल’ पारदर्शी होकर मेरे सामने खड़े थे। 
कहना पड़ता है में प्रबोध कुमार गोविल

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