DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

फिर से साथ

जनता परिवार की पांच पार्टियों का साथ आना इन पार्टियों के लिए कितना फायदेमंद होगा,  इस पर कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती,  लेकिन यह तय है कि आम जनता में इस प्रयोग को लेकर कोई उत्साह नहीं होगा। जनता परिवार के इतिहास में लोग जितनी तेजी से मिलते हैं,  उससे दोगुनी तेजी से छिटक जाते हैं। जनता पार्टी से टूटी पार्टियों में भाजपा ही एकमात्र स्थायी पार्टी रही है,  उसके अलावा कितनी पार्टियां बनीं,  कब विलय हुआ,  फिर कब टूट हुई,  यह इतिहास राजनीति शास्त्र के पारंगत पंडित भी ठीक से नहीं बता सकते। इसलिए इस नए प्रयोग के स्थायित्व को लेकर संदेह लाजमी है। ऐसा इसलिए भी है कि फिलहाल जनता परिवार की जो स्थिति है,  वह अपेक्षाकृत स्थायी है। तमाम बड़े नेताओं ने अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र चुन लिए हैं और उनकी दूसरे राज्यों में विस्तार करने की महत्वाकांक्षा खत्म सी हो गई है। उनका मुख्य ध्यान अपने राज्य पर ही होता है।

फिलहाल लोकसभा चुनाव बहुत दूर हैं,  लेकिन फिर भी एकता की कोशिश की जरूरत कई वजहों से है। सबसे बड़ी वजह भाजपा और नरेंद्र मोदी का बढ़ता प्रभाव है। भाजपा पहली बार पूर्ण बहुमत लेकर केंद्र में सत्ता में आई है और उसने राज्यों में भी अपना प्रभाव तेजी से बढ़ाया है। जो एक साथ आने वाली पार्टियों के राज्य हैं,  उनमें भी भाजपा ने अपना प्रभाव जमाया है और विशेष खतरा यह है कि जो जातियां या वर्ग इन पार्टियों के समर्थक रहे हैं,  उनमें भी उसने सेंध लगा दी है। ये सारी पार्टियां मुख्यत: अपने-अपने राज्यों की प्रमुख पिछड़ी या किसान जातियों की पार्टियां हैं,  इनके ज्यादातर नेता समाजवादी पृष्ठभूमि से हैं,  इसलिए धर्मनिरपेक्ष भी हैं,  इसकी वजह से आमतौर पर अल्पसंख्यक उनके साथ रहते हैं। भाजपा की शुरुआत में भले ही ऊंची जातियों में ही इसका मुख्य जनाधार था,  लेकिन यह तेजी से पिछड़ी जातियों की पार्टी बनकर उभर रही है।

ऐसे में,  इन क्षेत्रीय पार्टियों के लिए खतरे की घंटी बज रही है,  जिनका आधार अपने-अपने राज्य की पिछड़ी जातियों में है। एक साथ आकर ये नेता केंद्र में भाजपा सरकार का मजबूती से मुकाबला कर पाएंगे,  जिसका फायदा उन्हें अपने-अपने राज्यों में हो सकता है,  अन्यथा लालू प्रसाद यादव, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की कोई मदद नहीं कर पाएंगे या नीतीश कुमार की वजह से एचडी देवेगौडा को कर्नाटक में कोई फायदा नहीं होगा। संसद में,  खास तौर पर राज्यसभा में उन्हें एकता का फायदा हो सकता है,  क्योंकि राज्यसभा में भाजपा के पास पूर्ण बहुमत नहीं है और इनका संगठित होना इन्हें राज्यसभा में कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बना देगा। एकता के इन प्रयासों की दूसरी वजह यह है कि इन लोकसभा चुनावों के बाद कांग्रेस की ताकत बहुत घट गई है। अब उसके पास संप्रग जैसे किसी गठबंधन का केंद्र बनने की ताकत नहीं है।

ऐसे में,  अन्य राजनीतिक ताकतों के लिए अपनी अलग रणनीति बनाना जरूरी हो गया है। भाजपा विरोधी मोर्चे का केंद्र पिछले दस साल में कांग्रेस बनी हुई थी,  इसलिए इन पार्टियों को अलग से एक संगठन या पार्टी बनाने की जरूरत नहीं थी,  अब स्थिति बदल गई है और इसी वजह से ये सभी नेता एक हो रहे हैं। लेकिन जनता-प्रयोग के शुरुआती दिनों से इन नेताओं का कद बहुत बड़ा हो गया है,  तो जब उस वक्त ये साथ नहीं रह पाए,  तो अब कैसे रहेंगे?  राजनीति में समाजवाद अब सिर्फ शब्द भर है,  उसके पीछे कोई विचारधारा नहीं बची है। ऐसे में,  सिर्फ भाजपा विरोध के सहारे कब तक  निभ पाएगी,  यह भी सवाल है। लेकिन राजनीति में कुछ भी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती,  खासकर मामला जब जनता परिवार का हो।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:फिर से साथ