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शहीद राधेश्याम को नम आंखों से दी गई अंतिम विदाई

शहीद राधेश्याम का पार्थिव शरीर गुरुवार को पंचतत्व में विलीन हो गया। बड़हरा के बलुआ घाट पर नम आंखों से शहीद को विदाई दी गई। इस दौरान पूरा घाट राधेश्याम अमर रहे के नारों से गूंज उठा। शहीद के बड़े पुत्र अभिजीत कुमार के मुखाग्नि देते ही लोग फफक पडे़। इससे पूरा माहौल गमगीन हो उठा। इस अवसर पर सशस्त्र बलों ने शहीद को सलामी दी गई। उनके सम्मान में जवानों ने फायरिंग भी की गई। इससे पहले शहीद के घर से शव यात्रा निकाली गयी।

गजराजगंज, कारीसाथ, धोबहां बाजार, हेमतपुर व सलेमपुर गांव होते हुए यात्रा करीब बीस किलोमीटर की दूरी तय कर बलुआ घाट पहुंची। शव यात्रा में हजारों लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था। शहीद का दर्शन करने के लिए रास्ते में हजारों लोग खड़े थे। जगह-जगह यात्रा को रोक कर स्वागत किया जा रहा था। वाहनों के काफिले के साथ यात्रा में शामिल हजारों लोग शहीद के समर्थन में नारे लगा रहे थे। सुबह करीब सात बजे निकली शव यात्रा 11 बजे बलुआ घाट पहुंची, वहां सारी रस्म पूरी करने के बाद शहीद को मुखाग्नि दी गई।

मुखाग्नि देते ही बड़ा पुत्र बिलख पड़ा। उसके साथ ही अन्य दोनों बेटे के अलावा वृद्ध बाप व दोनों भाई भी फफक पड़े। इसे देख मौके पर मौजूद लोग भी अपने को नहीं रोक सके और सभी की आंखें छलछला गईं। इस अवसर पर संदेश विधायक संजय सिंह टाईगर, पूर्व विधायक विजयेन्द्र यादव, लोजपा नेता राजेश्वर सिंह, महेश पासवान, कमलेश पासवान, बीरबल यादव, अजय गांधी, दलित सेना के बनारसी प्रसाद आजाद, संजीव कुमार चौधरी, सरोज पासवान, राजेन्द्र तिवारी, मेजर राण प्रताप के अलावा सीआरपीएफ के मेजर मुकेश चंद सिंह, आर एन सिंह व मान सिंह राजपूत, आरा बीडीओ संजय पाठक, उदवंतनगर बीडीओ मनीष श्रीवास्तव, गजराजगंज व धोबहां ओपी के प्रभारी सहित हजारों की संख्या में लोग उपस्थित थे।

आठ वर्षीय पुत्र करण ने दी पिता की अर्थी को कंधा
नक्सलियों के हमले में जान न्योछावर करने वाले राधेश्याम का आठ वर्षीय पुत्र करण ने जब अपने पिता की अर्थी को कंधा दिया, तो लोगों का कलेजा पसीज गया। गुरुवार की सुबह जब शहीद की अर्थी निकली, तो चौदह वर्षीय पुत्र अभिजीत, दस वर्षीय बेटा हिमांशु और आठ वर्षीय पुत्र करण अपने नन्हों कंधों पर उठा लिया। शहीद के भाई के अलावा विधायक संजय सिंह टाईगर व सीआरपीएफ के अधिकारियों ने भी उनकी अर्थी को कंधा दिया। विधायक ने कहा कि शहीद को कंधा देकर उनका पूरा जीवन धन्य हो गया। ऐसा सौभाग्य किसी-किसी को ही मिलता है।

आशीर्वाद के लिए निकला सूरज, मौन हुईं गंगा मइया
शहीद का शव जब बलुआ घाट पहुंचा, तो पूरा वातावरण ओस की चादर लपेटे हुए था, पर जैसे ही मुखाग्नि दी गई सूरज भी बादल की ओट से निकल पड़ा। इसे देख ऐसा लगा मानों सूरज भगवान भी शहीद को आशीर्वाद देने के लिए निकल पडे़ हैं, वहीं गंगा की धारा भी पूरी तरह शांत थी, जिससे लग रहा था कि हिलोरे मारने वाली गंगा अपने बेटे के स्वागत करने के लिए मौन हो गई थीं।

सन्नाटे को चिर रही थी लोगों की चीत्कार
शहीद राधेश्याम का पार्थिव शरीर गुरुवार की सुबह बलुआ घाट पर पहुंचा, तो पूरा माहौल गमगीन था। घाट पर चारों ओर मातमी सन्नाटा पसर गया और पूरा वातावरण खामोशी की चादर में सिमट गया। सन्नाटा तब टूटा जब शहीद को सलामी देने के लिए जवानों ने हवाई फायरिंग की। सलामी के बाद एक बार फिर सन्नाटा पसर गया। दूसरी बार सन्नाटा तब खत्म हुआ, जब बडे़ पुत्र ने मुखाग्नि दी। पुत्र के चीत्कार से लोगों का कलेजा दहल जा रहा था। तीनों बच्चे जब पापा-पापा कह कर बिलख रहे थे, तो लोग भी अपनी आंसू नहीं रोक पा रहे थे। किसी में बच्चों को चुप कराने की हिम्मत नहीं हो रही थी। 

पति के शव से लिपट कर घंटों रोती रही मीना
गुरुवार की सुबह करीब साढे़ छह बज रहे थे। शहीद राधेश्याम के घर में कोहराम मचा था। घर के अंदर से महिलाओं की रोने की आवाजी आ रही थी। इस बीच शहीद के पार्थिव शरीर को ले जाने की तैयारी शुरू कर दी जाती है। ताबूत में रखे शव को गाड़ी पर रखने के लिए घर से बाहर निकाला जाने लगा, तभी शहीद की पत्नी मीना देवी बदहवास अपने घर से निकलती है और ताबूत से लिपट जाती है। घर की महिलाएं उसे किसी तरह अलग करने का प्रयास कर रही थी, पर वह हटने का नाम नहीं ले रही थी।

तिरंगे में लपेटे गये पार्थिव शरीर से लिपटकर वह घंटों रोती रही। वह अपने पति को ले जाने से रोकने का भरसक प्रयास कर रही थी। कभी दहाड़ मार कर रो रही रही थी, तो कभी माथा पटक रही थी। बूढ़ी मां और चारों बहनें भी पागलों की तरह ताबूत के बगल में बैठकर रोये जा रही थी। मां एक ही बात की रट लगा रही थी कि हमरा बबुआ के मत ले जा लोग। आरे हमार बबुआ सुतल बाडे़। उनकी चीत्कार से लोगों का दिल बैठा जा रहा था। बाद में किसी तरह शहीद के पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया।

गजराजगंज में बनाया जाए स्मृति द्वार
छत्तीसगढ़ के चिंतागुफा में नक्सली हमले में शहीद राधेश्याम के नाम पर गजराजगंज में स्मृति द्वारा बनाने की मांग तेज हो गई है। अंतिम संस्कार के लिए बलुआ घाट पर ले जाने के दौरान ग्रामीणों ने जिला प्रशासन के अधिकारियों से इसकी मांग की। पूर्व विधायक विजयेन्द्र प्रसाद यादव सहित अन्य नेताओं ने भी गजराजगंज बाजार में तिरोजपुर गांव जाने वाली सड़क के सामने स्मृति द्वार व गांव में स्मार बनाने की मांग की है। गांव तक जाने वाली सड़क का नामकरण भी शहीद के नाम पर करने की मांग की गई।


नन्हें- मुन्ने बच्चों ने राधेश्याम के शहादत को किया सलाम
छत्तीसगढ़ के सुकमा में शहीद हुए सीआरपीएफ के जवान राधेश्याम राम की शहादत को बिहिया के स्कूली बच्चों ने गुरुवार को सलाम किया। दरअसल, शहीद राधेश्याम और उनके परिवार का बिहिया नगर से खास नाता है। शहीद की पुत्री मुस्कान कुमारी नगर के महथिन रोड स्थित रदर फोर्ड इंग्लिश स्कूल में कक्षा दो की छात्रा है। मुस्कान की मम्मी अपनी बच्चों को पढ़ाने के लिए बिहिया में ही किराये के मकान में रहती है।

मुस्कान के पापा की शहादत की सूचना मिलते ही पूरा विद्यालय परिवार शोक में डूब गया। गुरुवार को मुस्कान के स्कूल में शहीद के याद में छात्र छात्राओं और शिक्षक शिक्षिकाओं ने कैडिंल जलायी और श्रद्धाजंलि सभा का आयोजन किया गया। सभा में दो मिनट का मौन रखकर गहरा शोक व्यक्त किया गया। स्कूल के प्राचार्य राजू रंजन और सचिव नवनित्य रंजन ने कहा कि देश के लिए जान गंवाने वाले शहीद कभी नहीं मरते हैं। राधेश्याम जैसे अमर शहीद को युगों -युगों तक याद किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि शहीद की पुत्री की पढमई के लिए हर संभव सहयोग प्रदान किया जाएगा। श्रद्धाजंलि सभा में वर्षा सिन्हा, चंदन सिंह, सरिता कुमारी, सुनील कुमार, अनामिका कुमारी, अनिता कुमारी के आलावा विद्यालय के सैकडमें छात्र छात्रा शामिल रहे।

अब महथिन मंदिर में माथा टेकने नहीं आएंगे शहीद राधेश्याम
गजराजगंज ओपी के तिरोजपुर गांव निवासी व सुकमा में शहीद हुए सीआरपीएफ के जवान राधेश्याम राम का बिहिया स्थित पवित्र महथिन माई के प्रति अगाध श्रद्धा और भक्ति थी, लेकिन दुर्भाग्य की अब राधेश्याम मां महथिन के दरबार में माथा टेकने और पूजा अर्चना करने कभी नहीं आ पाएंगे।

बिहिया नगर स्थित जिस रदर फोर्ड इंग्लिश स्कूल में राधेश्याम की पुत्री मुस्कान पढ़ती है। उस स्कूल के प्राचार्य राजू रंजन ने बताया कि राधेश्याम बाबू जब भी स्कूल में आते थे तो स्कूल से कुछ दूरी पर स्थित पवित्र महथिन मंदिर में पूजा अर्चना करने जरूर जाते थे। प्राचार्य ने यह भी बताया कि वे काफी सह्दय और दयालु भी थे। स्कूल में आने पर सभी बच्चों के साथ प्यार और स्नेह बांटकर ही जाते थे।

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