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झारखण्ड के नक्सली इलाके में पनप रही है मिथिला पेंटिंग

झारखण्ड के नक्सली इलाके में पनप रही है मिथिला पेंटिंग

बंदूक के साए में कला पनप रही है। जोन्हा और उसके आसपास के नक्सल प्रभावित इलाके कोयनारडीह,  पइका, गौतमधारा,  जराटोली,  अमरूद बगान लेप्सर,  झूझीगाढ़,  जिद्दू के लोगों के जीवन में मधुबनी पेंटिंग ठंडी हवा के झोंके की तरह से आया है। जोन्हा से सटे चंदाडीह गांव के एक चबुतरे पर मधुबनी पेंटिंग का वर्कशॉप चलाया गया।  इन सभी को मधुबनी से आई शालिनी कर्ण और बीएचयू के अविनाश कर्ण  ने पूरी तन्मयता से पेंटिंग सिखाया। शालिनी के मुताबिक सरकार और नक्सली अपनी लड़ाई में लगे हुए हैं। परेशानी दोनों के बीच में रह रहे लोगों को है। इनके लिए कला क्रांति लाना जरूरी है। पेश है खास रिपोर्ट

जलावन काटना छोड़ सीखा पेंटिंग
10 किमी साइकिल चलाकर आए निरंजन बेदिया बिना सांस लिए फटाफट पेंटिंग करने में जुट गए हैं। वह रोज साइकिल चलाकर कोयनारडीह से सीखने आते। कभी मजदूरी तो कभी जंगलों में जलावन काटने का काम करते हैं। डरे सहमे से दिख रहे निरंजन ने बताया कि कई बार खेती चौपट हो जाती है तो काम नहीं मिलता। जंगल से लकड़ी काटकर खाने का जुगाड़ हो जाता है। अब पेंटिंग से इस कमी को पूरा करने का भरसक कोशिश करेंगे। कभी सपने में भी नहीं सोचे थे कि इ काम भी करेंगे। photo1


बच्चे को संभालते बुना चित्रनुमा सपने
सुनीता देवी कभी बेतरा में रखे एक साल के बच्चे को संभाल रही है तो कभी कूची को। वह हर दिन 9 बजे तक घरा का सारा काम निबटा कर,  मुर्गियों को खाना खिलाकर यहां पहुंच जाती है। बच्चा जब रोता है तो दूध पिलाती है,  फिर अपने नए सपने को रंग देने लगती है। 28 साल की यह महिला नक्सली और सरकारी बंदूकों के बीच एक अलग दुनिया को ओर बढ़ रही है। इनकी तरह मइनी देवी,  राजकिशोर उरांव,  रथुआ बेदिया,  बुधेश्वर महतो,  दशमी कुमारी, सुकरमनी कुमारी,  सीमा मुंडा,  कांजो देवी, धर्मनाथ महतो, रजनी कच्छप जैसे कई लोग हैं।

भौचक हूं इनकी प्रतिभा से photo3
पिछले 12 साल से पेंटिंग कर रही शालिनी कर्ण के मुताबिक वह इनकी प्रतिभा से भौचक है। केवल 7 दिन में इसकी सफाई के साथ किसी को पेंटिंग सीखते नहीं देखा। यदि इनके साथ लगातार 6  महीना काम किया जाए को यह पूरी तरह तैयार हो जाएंगे। अविनाश कहते हैं कि यहां आने से पहले सोचा था कि सात दिन में बेसिक भी सिखा पाया तो बहुत होगा। क्योंकि किसी ने कभी ब्रश नहीं पकड़ा था। मधुबनी पेंटिंग के बारे में जानना तो दूर की बात। लेकिन जिस तरह से सभी ने रुचि दिखाई,  वह बड़ी उम्मीद जगाती है। 

कलाभवन में एग्जिबिशन लगाने की तमन्ना  photo4
पेंटिंग की तरह इनके सपने भी रंगीन हैं। सीमा देवी कहती है कि वह अपनी पेंटिंग दुनिया को दिखाना चाहती है। साथ ही अपने ग्रुप के लोगों का पेंटिंग को भी। पूरे वर्कशॉप को कॉर्डिनेट कर रहे मंगेश झा ने बताया कि इनके इस मेहनत को होटवार के रामदयाल कलाभवन में एग्जिबिशन लगाने की कोशिश करेंगे। नाम रखा है पहला प्रयास। क्योंकि ग्रुप में सभी ने पहली बार कूची थामा है।

हर रविवार जुटेंगे चबुतरे पर
सोमवार को वर्कशॉप के अंतिम दिन सभी को ब्रश,  रंग और कुछ कागज दिए गए। ताकि वह लगातार अभ्यास करते रहे। फैसला हुआ कि अब इस हुनर को निखारते चले जाना है। इसके लिए चांदीडीह गांव के इसी चबुतरे पर हर रविवार 10  बजे से अभ्यास कार्यशाला आयोजित की जाएगी। इसमें आसपास के गांवों के दूसरे लोगों को भी आमंत्रित किया जाएगा। ताकि उन्हें इस कला से रू-ब-रू कराया जा सके।



आसपास के गांवों को बनाएंगे खूबसूरत
चांदीडीह के इस चबुतरे पर पेंटिंग बनाने के बाद अब आसपास के गांवो की बारी है। नबंबर से हर रविवार को एक गांव का चयन किया जाएगा। वहां के किसी एक सार्वजनिक चबूतरे को मधुबनी पेंटिंग में रंग दिया जाएगा। पहली पेंटिंग जोन्हा फॉल के नजदीक किया जाएगा। इस मुहिम में इस 55 कलाकारों के अलावा प्रधान रिजुआ मुंडा,  माया बेदिया,  जगदीश मुंडा शामिल हैं। रिजुआ मुंडा के मुताबिक उनका क्षेत्र अब खूबसूरत लगने जा रहा है। साथ ही ग्रामिणों के लिए रोजगार का बड़ा अवसर मिलने जा रहा है।

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