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रउए कहीं, केकरा वोट दियाई

त्रिभुवन जी आम जनता हैं, जागरूक वोटर हैं। पहले मूंगफली बेचते थे, अब चना बेचते हैं। छपरा में सिर्फ जन्म लिया, रांची में सारी जिंदगी बिता दी। चुनाव और नेताओं के पैंतर खूब देखे। कोई भी उन्हें बिना तवज्जो दिये निकल जाता है, पर त्रिभुवन जी कहते हैं- सब बइमान, शैतान बाड़न स। केकरा वोट दियाओ, बुझाते नइखे। राजनीति भरस्ट हो गइल बा। नेता सब मनमानी कर ताड़न स। हमनी के केहु पूछता.।ड्ढr इस आम आदमी की चार लाइना में क्या कोई गूढ़ बात है? बेख्याली में इतना कुछ कह जानेवाले त्रिभुवन जी उम्र के अंतिम पड़ाव में भी राजनीति से रिश्ता तोड़कर बैठ जाना नहीं चाहते। उनके मन में डोलड्रम चल रहा है- केकरा वोट दियाओ। साफ है, राजनीति की गंदगी ने उन्हें भ्रमित कर दिया है। वोट के अधिकार और ताकत से परिचित यह शख्स कहता है- वोट त जरूर देब। फिर धीर से इस संवाददाता के कान में मुंह सटाकर कहते हैं- रउए कहीं, केकरा वोट दियाई?ड्ढr त्रिभुवन जी लौटते हैं अतीत में। टूटी फूटी हिन्दी में कहते हैं- पहले कोई पसंदीदा नेता आता था, तो एक घंटा पहले ही हम भाषण सुनने पहुंच जाते थे। तब के नेताओं में ईमानदारी थी। अपने राज्य और देश को बनाने की इच्छाशक्ित थी। वह धीर से हंसते हुए हवा में हाथ लहराते हैं और कहते हैं- इ बइमनवा सब के वोट देवे के मन ना करला, बाकिर का करीं, भारी चोर के बीच में तनी कम चोर जे बा, आेकर वोट देके चल आइला। मतलब साफ है- राजनीति की गंदगी ने आम आदमी तक की पीड़ा बढ़ा दी है। सीमित विकल्प के बीच किसी एक को चुनने की जद्दोजहद है। त्रिभुवन जी जसे लोग इस राज्य में लाखों की संख्या में हैं। वे अपनी उम्र से ज्यादा राजनीति की गिरावट का प्रतिशत देखने को मजबूर हैं। फिर भी लोकतंत्र के प्रति उनकी आस्था कहीं से कम नहीं हुई है।ड्ढr चने के ढेर साफ करते हुए, उसपर पानी छिड़कते, ग्राहकों को निपटाते उनकी उम्र निकल रही है। पर लोकतंत्र लगातार जवान हो रहा है। वह कहते हैं- अबकी बार वोट दे देब, अगिला बार का जाने जियब की मरब। बाकिर नेतवा सब ना सुधर के कसम खा लेले बाड़न स। झारखंड के लूट लेलन स। हमनी के त जहां रहीं, उंहे रह गईनी, पर आवेवाला पीढ़ी के कुछ भला होखो। यह कहते हुए वह ठेला आगे बढ़ा देते हैं। मैली-कुचैली धोती पहना यह शख्स सहाता से सीख देता हुआ निकल जाता है।

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