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बाधा पर विजय

हर साल तीन दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय विकलांगता दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर कुछ ऐसे साहसी लोगों की कथा, जिन्होंने अपनी हिम्मत और हौसले से अपनी बाधाओं को ताकत में बदल दिया। हुमैरा अंसारी और अंतरा सेनगुप्ता की रिपोर्ट

जनसंचार में स्नातकोत्तर की फाइनल परीक्षा से कुछ दिन पहले 2010 में 29 साल की निधि गोयल को कितना संघर्ष करना पड़ा था, वह इसे कभी नहीं भूल सकतीं। ये विजुअली चैलेंज्ड कार्यकर्ता बताती हैं, ‘उन्होंने मुझसे मेरी सहायता के लिए किसी लिखने वाले या अतिरिक्त समय में से किसी एक विकल्प को चुनने के लिए कहा।’ वह आगे कहती हैं, ‘आखिर मैं अतिरिक्त समय लेकर क्या करती, जब मुझे कोई लिखने वाला ही नहीं मिलता? सिर्फ इसके लिए मुझे उनके साथ कई बैठकें करनी पड़ीं, सरकारी नियमों का हवाला देना और दिखाना पड़ा, तब कहीं जाकर वे मुझे दोनों सुविधाएं देने को तैयार हुए।’ निधि की राह लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स ने आसान की, जहां से वह डेवलपमेंट स्टडीज में परास्नातक कर रही हैं। वह बताती हैं, ‘यहां मुझे एक मोबिलिटी इंस्ट्रक्टर मिला है। इसके साथ  एक लाइब्रेरी सदस्य और वॉलंटियर मेरी अध्ययन में मदद करते हैं, जिससे मुझे सुविधा होती है।’

निधि अब एक वेबसाइट ‘सेक्सुअलिटी एंड डिसेबिलिटी’ की सह-लेखिका हैं। उनके 34 वर्षीय भाई आशीष भी नेत्रहीन हैं। वह अमेरिका के वार्टन बिजनेस स्कूल के पहले नेत्रहीन छात्र थे। वर्तमान में वे लंदन में हेज फंड आधारित ब्लू क्रेस्ट कैपिटल में पोर्टफोलियो मैनेजर हैं। गोयल भाई-बहन इस कोशिश में लगे हैं कि युवा विकलांगता की बाधा पार कर योग्य और सार्थक जीवन जीएं।  नेशनल सेंटर फॉर प्रमोशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट फॉर डिसेबल्ड पीपुल के निदेशक जावेद आबिदी कहते हैं, ‘इंटरनेट, आधुनिक तकनीकों और मीडिया का शुक्रिया, जिन्होंने इस विषय पर व्यापक पैमाने पर जागरूकता फैलाई। मेरा मानना है कि सोशल मीडिया ने युवाओं को अन्य साधनों से कहीं ज्यादा सशक्त किया है और विकलांगता के साथ जीने की उनकी सोच में परिवर्तन लेकर आया है।’ रेशमा वल्लिअप्पन भी इस बात से सहमत हैं। वह कहती हैं, ‘मैं इस बात से कभी परेशान नहीं होती कि लोग क्या कहते हैं।’

यही सोच मसूदुर्रहमान वैद्य की भी है। हालांकि उनके अनुसार, यह जरूरी नहीं कि आर्थिक संसाधनों तक हर किसी की पहुंच हो ही, जो एक बहुत बड़ा कारण है। स्पास्टिक सोसाइटी ऑफ इंडिया (अब इसे एडॉप्ट या एबल डिसेबल ऑल पीपुल टुगेदर कहते हैं ) के संस्थापक चेयरपर्सन मिठु अलुर कहते हैं, ‘हर कोई इतना भाग्यशाली नहीं होता कि आर्थिक संसाधनों के साथ-साथ उसे माता-पिता का समर्थन भी मिल जाए। हमारे देश में लाखों विकलांग अब भी हाशिये पर, उपेक्षित या पीड़ित हैं। इसका नतीजा यह होता है कि उनकी क्षमता बरबाद हो जाती है।’

लोगों को हंसाना है काम
बेंगलुरू : संदीप राव, उम्र: 31, नेत्रहीन, स्टैंडअप कॉमेडियन

संदीप राव 2012 से स्टैंडअप कॉमेडियन हैं। उन्होंने अपने इस शौक के लिए कॉपी राइटर की नौकरी छोड़ दी। अपना पहला शो उन्होंने बेंगलुरू के एक पब में किया, लेकिन पहली एकल प्रस्तुति 2013 में दी। वह कहते हैं, ‘जब मैंने दर्शकों से पहले-पहल कहा कि मैं नेत्रहीन हूं तो दर्शकों ने विश्वास ही नहीं किया। उन्हें लगा कि यह मेरे एक्ट का हिस्सा है।’ राव जब आठ साल के थे, तब उन्हें डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें जुवेनाइल मैकुलर डिजेनेरेशन है। उनका सेंट्रल विजन नहीं है और दाहिने आंख का पेरिफेरल विजन 60 प्रतिशत और बाएं का 40 प्रतिशत खो चुके हैं। अपनी विकलांगता पर राव कहते हैं, ‘परिवार ने प्रोत्साहित किया, खासकर मां ने।’ उन्होंने नियमित रूप से स्कूल जाना जारी रखा। क्रिकेट, फुटबॉल और गोल्फ खेलते रहे। अमेरिका के लिनफील्ड कॉलेज से समाजशास्त्र में स्नातक भी किया। वह कहते हैं, ‘भारत में विकलांगों के समान अधिकार की लड़ाई में दो सबसे बड़ी बाधाएं हैं- या तो लोग पूर्वाग्रह से ग्रस्त होते हैं अथवा उदासीन, साथ में सरकारी उदासीनता तो है ही।
हुमैरा अंसारी


रेशमा की लड़ाई जारी है
पुणे : रेशमा वल्लिअप्पन, उम्र: 34, सिजोफ्रेनिक, प्रोफेशनल माइम कलाकार और मेंटल हेल्थ एडवोकेट

22 साल की उम्र में रेशमा वल्लिअप्पन को यह पता चला था कि उन्हें सिजोफ्रेनिया है। विद्रोही तेवर वाली रेशमा कभी-कभी इस बारे में बात नहीं करना चाहतीं। वह कहती हैं, ‘माइम ने मुझे इस अंधेरे से निकाला। जब मैं कनाडा गई थी, उस दरमियान वहां नुक्कड़ कलाकारों से बातचीत की। उनमें से बहुत सारे लोगों ने मुझे ढेर सारे आइडिया दिये।’ रेशमा ने अपने माइम के कई वीडियो यू-ट्यूब पर अपलोड किये हैं। वह कहती हैं, ‘सिजोफ्रेनिया के बावजूद मेरे पिता हमेशा मेरे समर्थन में खड़े रहे। उन्होंने मुझे हमेशा बढ़ईगिरी में व्यस्त रखा, जबकि लोग सोचते थे कि यह काम मेरे लिए बेहद खतरनाक है। मेरे पिता की सकारात्मक सोच ने मुझे खुद को पहचानने में मदद की।’ रेशमा वर्तमान में फिलॉसफी एंड साइंस एंड रिलीजन में डबल मास्टर डिग्री लेने की प्रक्रिया में हैं। 2001 में उन्होंने ‘रेड डोर’ नामक मानसिक स्वास्थ्य संबंधी एक ऑनलाइन कम्युनिटी शुरू की। इस कम्युनिटी के 800 से भी ज्यादा सदस्य हो गए हैं। वह इस मंच का उपयोग बेहतर मेंटल हेल्थ केयर के लिए भी कर रही हैं। वह कहती हैं, ‘हमारी लड़ाई जारी है। लोग अकसर मुझसे कहते हैं कि उन्हें मेरे सिजोफ्रेनिक होने का विश्वास नहीं होता।’
अंतरा सेनगुप्ता

शबाना की आंखों से दुनिया देख रहे 75 बच्चे
मेरठ : नाम शबाना, पोलियो प्रभावित, शिक्षिका

अपने लिए जिए तो क्या जिए, तू जी ऐ दिल जमाने के लिए...। इन पंक्तियों को मेरठ में सदर की रहने वाली शबाना ने जिंदगी में उतार लिया है। विकलांगता और उस पर मुफलिसी ने परिवार को हिला कर रख दिया, पर शबाना ने हिम्मत नहीं छोड़ी। भरण-पोषण अनुदान योजना के तहत विकलांग कल्याण विभाग से 300 रुपये महीने की मामूली-सी पेंशन द्वारा ही उन्होंने आत्मनिर्भरता की बड़ी जंग जीत ली। सरकारी योजना के तहत पहले उन्हें एक पीसीओ मिला। दो साल की पेंशन और पीसीओ की बचत से उन्होंने एक जनरल स्टोर खोल लिया। आज उनके पास अपना स्कूटर है, जिससे वह अपने सभी जरूरी काम निपटाने के लिए शहर में निकलती हैं। आत्मनिर्भरता और आसमान में उड़ान भरने के ख्वाबों को शबाना ने यहीं नहीं रुकने दिया। उन्होंने ‘कोशिश वेलफेयर सोसाइटी’ नाम से एक एनजीओ बनाया। इस एनजीओ के बैनर तले नेत्रहीन बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल खोल दिया। इस स्कूल में इस वक्त 75 बच्चे हैं, जो शबाना की आंखों से दुनिया देख रहे हैं। शबाना की इन्हीं उपलब्धियों के लिए बुधवार को विकलांगता दिवस के मौके पर लखनऊ में मुख्यमंत्री ने उन्हें उत्कृष्ट रोल मॉडल अवॉर्ड से नवाजा।
सलीम अहमद

विश्व रिकॉर्ड ने मदद की
दिल्ली : नवीन गुलिया, उम्र: 41, ह्वील चेयर बॉन्ड विश्व रिकॉर्डधारी और एनजीओ संस्थापक

सैन्यकर्मी रहे नवीन गुलिया 1995 में इंडियन मिलिट्री एकेडमी के पैदल सेना बाधा प्रशिक्षण के दौरान गिर गए, जिससे उनकी रीढ़ की हड्डी टूट गई और वे कंधे से नीचे लकवाग्रस्त हो गए। दो साल तक अस्पताल में रहने के बाद 1997 में वह ह्वील चेयर पर घर लौटे। इसके बाद उन्होंने कम्प्यूटर मैनेजमेंट में परास्नातक किया और स्कूल में पढ़ाने लगे। 2000 में गुड़गांव में एक कोचिंग सेंटर शुरू किया। उसके बाद धीरे-धीरे वे अपने शौक की तरफ वापस लौटने लगे। वह बताते हैं, ‘मैंने ड्राइविंग शुरू की और फ्लाइंग क्लब ज्वॉइन किया।’ गुलिया का नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में दिल्ली से लेह के मारसिमिक ला तक बिना रुके गाड़ी चलाने के लिए दर्ज है, जो दुनिया में सबसे ऊंचा मोटर चलाने लायक पास है। इसमें उन्हें 55 घंटे लगे थे। गुलिया ने माइक्रोलाइट विमान और पैराग्लाइड्स भी उड़ाए हैं। उन्हें विश्व रिकॉर्ड के चलते दुनियाभर में पहचान मिली। अपनी प्रसिद्धि का इस्तेमाल उन्होंने सुविधाविहीन बच्चों के सपनों को पूरा करने के लिए एक एनजीओ शुरू करके किया। गुलिया अब शादीशुदा जिंदगी जी रहे हैं। उनकी पत्नी भी उनके एनजीओ में मदद करती हैं।
दानिश रजा

बिना पैर इंग्लिश चैनल पार की
प. बंगाल : मसूदुर्रहमान वैद्य, उम्र: 45, दोनों पैरों से विकलांग

उत्तरी चौबीस परगना के मसूदुर्रहमान वैद्य जब 9 साल के थे, तब भागते हुए एक मालगाड़ी के नीचे आ गए, जिसकी वजह से घुटने के नीचे उनके दोनों पैर काटने पड़े। वह बताते हैं, ‘मैं लगभग दो साल तक अस्पताल में रहा, लेकिन तब भी तैराकी मेरा पहला प्यार बना रहा, जिसने मुझे इस त्रासदी से निकलने में बहुत मदद की।’ 1997 में इंग्लिश चैनल पार करने वाले वैद्य पहले ऐसे व्यक्ति बने, जिनके दोनों पैर नहीं थे। 2001 में उन्होंने जिब्राल्टर जलडमरूमध्य पार किया। उनका अगला लक्ष्य है पाक जलडमरूमध्य को पार करना और वह इसके लिए 2010 से एक प्रायोजक की तलाश में हैं।  
पूजा मेहता

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