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विश्व-स्तरीय क्यों नहीं हैं हमारे शिक्षा संस्थान

विश्व-स्तरीय शिक्षण संस्थानों की किसी भी सूची में 200वें नंबर तक भारत के किसी विश्वविद्यालय की गिनती नहीं होती है। ऐसी हर सूची के बाद हम चिंता व्यक्त करने के अलावा कुछ नहीं करते। यह नहीं सोचा जाता कि शिक्षा केंद्रों का निर्माण समाज के भीतर से ही होता है। इसलिए समाज की विशेषताएं-दुर्बलताएं वहां भी दिखाई पड़ती हैं। शिक्षा केंद्रों के तीन घटक होते हैं- शिक्षक, शिक्षार्थी और सहायक समूह। इन वर्गों की भूमिका का अलग-अलग आकलन हो।

शिक्षक ज्ञान के विकास व प्रसार के माध्यम से समाज को बेहतर बनाने का सामाजिक अभिकर्ता होता है या उसे होना चाहिए। हमारे समाज में एक समुदाय के रूप में शिक्षकों की नैतिक मान्यता समाप्तप्राय है। शिक्षक की विफलता के मूल में उसकी चेतना में मौजूद सामाजिक जड़ता है। इस नाते शिक्षक से एक खास तरह की गरिमा की अपेक्षा रहती है, लेकिन विभिन्न सामाजिक विवशताओं के नाते ऐसा हो नहीं पाता। ज्ञान से उत्पन्न चेतना या प्रकाश की सामाजिक स्वीकार्यता नहीं बन पाई है। इसीलिए शिक्षक अपने ज्ञान को यथासंभव कक्षाओं और किताबों तक ही सीमित रखते हैं। कई बार इस अभ्यास से स्वयं उनका उस ज्ञान से विश्वास उठ जाता है, जिसे वे बांटते हैं। सामाजिक वर्ग के रूप में उन्हें प्राय: ऊंची तनख्वाह पाने वाले निकम्मे और अनुपयोगी वर्ग के रूप में देखा जाता है। ऐसे माहौल में शिक्षकों से सृजनशील होने की अपेक्षा बेमानी है।

शिक्षार्थियों की स्थिति भी कई तरह से विषम है। सरकारी स्कूलों से लेकर प्राइवेट स्कूल तक बच्चों का जेहन कुंद करने में लगे रहते हैं। बच्चों के भीतर की सहज प्रश्नाकुलता ही खत्म हो जाती है। इस नाते एक बड़ा तबका अद्र्धशिक्षित दशा में उच्च शिक्षा केंद्रों  में लगभग उद्देश्यहीनता की स्थिति में दाखिल होता है। प्राय: उसे यह मालूम नहीं होता कि वह उच्च शिक्षा किसलिए प्राप्त करना चाहता है। इसलिए ऐसे लोग एक तरह की निराशा के शिकार हो जाते हैं। यह वातावरण भी उच्च शिक्षा केंद्रों को विश्व-स्तरीय दर्जा दिलाने में बहुत बड़ी बाधा है।

इसके अलावा जिन्हें गैर-शैक्षणिक कर्मचारी कहा जाता है, वे ‘गैर-शैक्षणिक’ होने की अतिरिक्त नकारात्मकता के शिकार हैं। उनके भीतर यह एहसास काम करता रहता है कि वह कहीं से हीन है, इसलिए अमूमन उनका रवैया शिक्षण व शिक्षक विरोधी हो जाता है। इसीलिए संस्थानों के कार्यालय अक्सर सरकारी दफ्तर जैसे लगते हैं।
हम अमेरिका से तुलना तो करते हैं, लेकिन यह नहीं देखते कि वहां विश्वविद्यालयों में धुर आलोचकों के लिए जगह ही नहीं, पर्याप्त सम्मान भी है। जबकि हमारे यहां ये चाटुकारों, मौका-परस्तों और नाकाबिल लोगों की नर्सरी हैं। स्वतंत्र व्यक्तित्व ही नए विचारों को जन्म दे सकते हैं। नए विचारों को जन्म देकर ही कोई विश्वविद्यालय विश्व-स्तरीय हो सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

 

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