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परेशानियों के बाउंसर

वह जब बैट लेकर उतरे, तो उनकी ओर कई बाउंसर फेंके गए। आउट हुए। अगले मैच में फिर आउट हुए, लेकिन फिर एक दिन उन्होंने बाउंसरों को साध लिया। पाया कि शुरू में बॉल नहीं खेल पाने की जो निराशा थी, वह खत्म हो गई। महानतम क्रिकेटरों में एक सुनील गावस्कर के साथ यह हुआ था। हम भी निराश होते हैं। जिस भी क्षेत्र में हों, हमें बाउंसर परेशान करते हैं। ऐसे में, अगर हम परेशान हुए, तो परेशानी पीछा नहीं छोड़ने वाली। परेशानी का काम है आना और आपका काम है उसे बुहारकर बाहर कर देना।

एक रूसी कहावत है- हथौड़े की चोट शीशे को तोड़ देती है, पर लोहे को फौलाद बनाती है। सवाल यह है कि आप निराशा के चक्रव्यूह में उलझ शीशे में बदल जाते हैं या चोट खाकर लोहे में ढल पाते हैं? अमेरिकी मनोवैज्ञानिक डॉक्टर ब्रायन बोनर ने एक शोध में पाया कि निराश होते ही अपने बारे में आपकी धारणा बिल्कुल गलत हो जाती है। आप अपनी शक्ति करीब-करीब भूल जाते हैं। ऐसे में, सकारात्मक और खुद पर विश्वास बनाए रखने की जरूरत है। निराशा अक्सर यह सोच साथ लेकर आती है कि जिदंगी ने उनके साथ नाइंसाफी की है। वे अपनी अड़चनों की फितरत समझ नहीं पाते। दरअसल, वह तो हर सफल शख्स को समान रूप से परेशान करती है। अब परेशानी के सामने घुटने टेक दिए जाते, तो पोलियोग्रस्त विल्मा रूडोल्फ जिंदगी भर अपनी किस्मत को कोसती रह जातीं। लेकिन उन्होंने अपनी इच्छाशक्ति से अपने पोलियोग्रस्त पैरों में जान डाल दी और फिर ओलंपिक में दौड़ में तीन-तीन गोल्ड मेडल झटके। विल्मा ने अपनी जीत का श्रेय अपने पोलियोग्रस्त पैरों को दिया। उन्होंने अपनी हताशा के बारे में एक खूबसूरत बात कही है- ‘वह अक्सर आती, कुछ पल रहती और मैं उसे विदा कर देती, वह विल्मा थी कि उसने हमेशा निराशा से गिफ्ट झटके।’ यह गिफ्ट हम भी झटक सकते हैं।

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