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यह यू-टर्न अच्छा है

बांग्लादेश के साथ महत्वपूर्ण भूमि सीमा समझौता (एलबीए) पर अपने रुख के विपरीत जाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे पूरी तरह लागू करने की इच्छा जताई है। उनके इस कदम से उन आशंकाओं पर विराम लग गया कि संकीर्ण राजनीतिक बयानबाजियों को वह राष्ट्रीय हितों के आड़े आने देंगे। आशंकाएं निर्मूल नहीं थीं। दिसंबर 2013 में वरिष्ठ बीजेपी नेता और अब मोदी सरकार में वित्त और सूचना-प्रसारण मंत्री अरुण जेटली ने एलबीए का पुरजोर विरोध किया था। एलबीए के तहत भारत और बांग्लादेश में 162 छोटे टुकड़ों की अदला-बदली की जानी है, जो ‘गलती से एक-दूसरे के पास हैं’, ताकि सीमा निर्धारण का काम पूरा किया जा सके। पिछले साल दिसंबर में राज्यसभा सचिव को लिखे एक पत्र में जेटली ने इससे संबंधित विधेयक को सदन के पटल पर रखे जाने का विरोध करते हुए व चौंकाने वाला दावा करते हुए कहा था कि प्रस्तावित अदला-बदली से ‘संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन होगा।’ लेकिन रविवार को असम में दिए गए मोदी के बयान से लगता है कि उनकी सरकार अब इस विधेयक का पूरा समर्थन करेगी। भूमि सीमा समझौते पर ‘जेटली लाइन’ को दरकिनार कर देने से मोदी को भारत-बांग्लादेश संबंधों को नए स्तर पर ले जाने का मौका मिलेगा। लेकिन इसके लिए उन्हें तीस्ता समझौता को भी लागू करना होगा और नदी के निचले छोर पर मौजूद बांग्लादेश की वाजिब चिंताओं को दूर करने के लिए तैयार रहना होगा।
बीबीसी में सिद्धार्थ वरदराजन

 

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