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गिद्ध को पाल रहा है एक परिवार

अपनी सीमित कृषि जोत से एक किसान बमुश्किल पारिवारिक भरण पोषण कर पाता है। कुछ माह पूर्व खेत पर काम करते वक्त उसकी नजर एक घायल विलुप्त प्रजाति के गिद्ध पर पड़ी तो उसका घर लाकर उपचार शुरू करा दिया। परिवार शाकाहारी है, फिर भी इस पक्षी को नैसर्गिक भोजन मांस मजबूरन बाजार से खरीदकर खिला रहा है। पक्षी अब इतना हिलमिल गया है कि दिनभर खेतों में धमाचौकड़ी के बाद घर की छत पर ही रैन बसेरा करता है।

परिवार के सामने सबसे बड़ी समस्या गिद्ध के भोजन को लेकर पड़ रहे आर्थिक व्यय की बनी हुई है। अब इसे वन विभाग को सौंपने की तैयारी है।
यह दिलचस्प मामला शिकोहाबाद ब्लॉक के ग्राम बलुआ (ठकुरी) का है। किसान रामरतन का घर उसके खेतों पर बना है। करीब चार माह पूर्व खेत पर काम करते समय एक गिद्ध घायल अवस्था में दिखा। संभवत: वह बिजली के तारों में उलझ कर घायल हुआ होगा। उसके पैर से खून बह रहा था। रामरतन ने उसे घर ले जाकर दवा लगाई। उसे रोटी, फल, हरी सब्जियां खिलाने की कोशिश की, लेकिन उसने कुछ न खाया और न ही घर छोड़कर गया। कई दिनों भूखा रहने की वजह से गिद्ध काफी कमजोर होने लगा, तब गांव के किसी युवक ने कहा कि मांस खिलाओ। धार्मिक प्रवृत्ति के परिवार के लिए ऐसा कैसे संभव था, लेकिन गिद्ध की जान बचाने के लिए रामरतन का पुत्र संजीव दुकान से मांस लाया, जिसे पलभर में पक्षी चटकर गया। संजीव आसपास के गांव में कथा वाचन एवं श्रीमद् भागवत के पाठ में जाता है। यह उसके लिए प्रतिदिन की सामाजिक जंग जैसा है, लेकिन एक विलुप्त पक्षी को संरक्षण देना वह अपना धर्म मानता है। अब उसकी मंशा है कि वन विभाग उसे ले जाकर किसी संरक्षित प्रजनन केन्द्र पर छोड़ आए। हालांकि घर का एक भी सदस्य उस पक्षी से दूर होना नहीं चाहता, क्योंकि उसके पास रहने से परिवार के सदस्य जैसा लगाव हो गया है। रोजाना एक किलो मांस खिलाना किसान की आर्थिक स्थिति के चलते संभव भी नहीं हो पा रहा है। गिद्ध को खिलाए जा रहे एक किलो मांस की कीमत 150 रुपये तक आ रही है।

गिद्ध अब भारत में विलुप्तता के कगार पर
अरांव। गिद्ध प्रजाति भारतीय उप महाद्वीप में ही नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया में विलुप्त के कगार पर पहुंच गई है। दो दशक पूर्व भारत में इनकी संख्या करीब चार करोड़ आंकी गई थी, लेकिन अब गिद्धों की संख्या हजारों में सिमट गई है। वर्ष 1996 से 2006 के बीच गिद्धों की संख्या में काफी गिरावट आई है।

पशुओं की डायक्लोफेनाक दवा कहर बनकर टूटी
अरांव। विश्व विख्यात वैज्ञानिक पत्रिका नेचर के जनवरी 2004 के अंक में खुलासा किया गया था कि पशुओं को दर्दनाशक दवा के रूप में दी जाने वाली डायक्लोफेनाक ने गिद्धों का अस्तित्व खतरे में डाला है। इस दवा के अंश मरे पशुओं का मांस खाने से गिद्धों के शरीर में प्रवेश कर गए। इससे गिद्धों की लीवर और किडनी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं। मात्र 72 घंटे में यह दवा गिद्धों को मौत के आगोश में पहुंचा सकती है। भारत सरकार ने इसे प्रतिबंधित कर दिया है। किटोप्रीफेन, एसेक्लोफेनिक दवा भी गिद्धों के लिए घातक है।

भारत में प्रजनन केन्द्र स्थापित
 विलुप्त होती गिद्धों की प्रजातियों के संरक्षण के लिए भारत सरकार ने तेजी से कदम उठाए, जबकि पश्चिमी देशों ने इनके संरक्षण पर ठोस शुरुआत नहीं की है। जूलोजी सोसाइटी ऑफ लंदन, बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी एवं राज्य सरकारों के संयुक्त प्रयासों से पिंजोर (हरियाणा), राजमाटखव (पश्चिमी बंगाल), रानी (असम), मेंडोरा (मध्य प्रदेश) में प्रजनन केन्द्र स्थापित किए गए, लेकिन यहां संवर्धन में उत्साहवर्धक परिणाम नहीं आ रहे। कारण गिद्ध का जोड़ा जन्म के पांच वर्ष बाद प्रजनन योग्य होता है और साल में औसतन एक ही बच्चाे को जन्म देते हैं। उप्र सरकार ने भी बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी एवं एनजीओ की मदद से गिद्धों को बचाने का विशेष अभियान शुरू कर दिया है। इटावा की चंबल सेंचुरी में गिद्ध प्रजनन केन्द्र स्थापित करने की कवायद चल रही है।

गिद्ध प्राकृतिक स्वच्छकार होता है
गिद्धों का मुख्य आहार मरे हुए पशु हैं। इनके झुण्ड देखते ही देखते मृत पशुओं को चट कर जाते हैं। अन्यथा पशुओं के सड़ने से वातावरण में बैक्टीरिया फैल जाते हैं, तभी हम इसे मानव का मित्र पक्षी भी मानते हैं। यह प्राकृतिक स्वच्छकार है, लेकिन विलुप्त होती प्रजाति चिंता का विषय बनी हुई है।

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