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प्राथमिकी में देरी केस कमजोर करने का पहला कदम

पुलिस की लापरवाही एवं कमजोर अभियोजन के कारण अपराधी के बरी होने के मामले में पटना हाईकोर्ट ने गृह विभाग सहित अभियोजन निदेशालय को कई निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि प्राथमिकी दर्ज करने में देरी, केस को कमजोर करने का पहला कदम है। कुछ मामलों, खासकर नरसंहार के मामले में तो पुलिस घटना के कई घंटों बाद प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू करती है।

पुलिस ठीक से अनुसंधान नहीं करती और वरीय अधिकारी केस के पर्यवेक्षण की सिर्फ खानापूर्ति करते हैं। इसका सीधा लाभ अपराधियों को मिलता है। यहां तक कि गवाह को कोर्ट में समय पर पेश करने का काम भी अभियोजन नहीं कर पाता। ऐसे में जजों को मजबूरी में अपराधी को रिहा करने का फैसला देना पड़ता है।

अदालत ने ये बातें जहानाबाद में हुए नरसंहार के आरोपितों की अपील पर सुनवाई के दौरान कहीं। न्यायमूर्ति वीएन सिन्हा व न्यायमूर्ति पीके झा की खंडपीठ ने सुनवाई की। इस दौरान राज्य के गृह सचिव और अभियोजन के निदेशक प्रमुख कोर्ट में उपस्थित थे। गृह सचिव ने कोर्ट को बताया कि राज्य में करीब एक हजार थाना हैं। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के निर्देशों के आलोक में सरकार उच्चस्तरीय राज्य कमेटी और हर जिले में जिला कमेटी बनाने की कार्रवाई कर रही है।

केस में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के बारे में कार्रवाई करने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जा रही है। इस पर कोर्ट ने गृह सचिव एवं अभियोजन के निदेशक को सुप्रीम कोर्ट एवं पूर्व में हाईकोर्ट के आदेश पर की गई कार्रवाई का ब्योरा देने का आदेश दिया।

अदालत ने कहा कि सौ में से 95 केस अभियोजन एवं पुलिस की लापरवाही व गलती के कारण आरोपित बरी हो जाते हैं। पिछले कुछ वर्षो में कोर्ट में कई अहम केसों की सुनवाई हुई, लेकिन आरोपित के खिलाफ ठोस साक्ष्य नहीं आया, जिसके कारण अपराधी छूट गए। इससे समाज में गलत संदेश जाता है। सही न्याय करने के लिए प्रभावशाली साक्ष्य होना चाहिए।
मालूम हो कि बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामलों के बारे में कई अहम निर्देश जारी किया था। जिसके आलोक में पटना हाईकोर्ट कार्रवाई कर रही है।

क्या करे पुलिस
समय पर प्राथमिकी दर्ज कर सही अनुसंधान के बाद आरोप पत्र दायर करे तो अपराधी का बचना नामुमकिन।
आरोप पत्र दायर करने के पूर्व पीपी के साथ समीक्षा करें, अगर जरूरत पड़े तो पूरक आरोप पत्र दायर करें।
अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाए, ताकि कोई अधिकारी अपने काम में लापरवाही नहीं बरते।
अभियोजन निदेशालय गवाह को समय पर कोर्ट में पेश करे, ताकि गवाही के अभाव में अपराधी बरी न हो सके।
क्राइम मीटिंग में केस की समीक्षा का काम हो, ताकि अनुसंधानकर्ता और अन्य अधिकारी ठीक से काम करें।

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