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औरंगाबाद में तबाही की नक्सलियों की बड़ी साजिश

बिहार और झारखंड में सक्रिय सबसे प्रभावशाली नक्सली संगठन भाकपा माओ अपने संगठन की कुछ हालिया उपलब्धियों से उत्साहित है और इसने पुलिस और सत्ता तंत्र पर घातक एवं प्रभावी हमले की योजना तैयार की है। इसके अंतर्गत अपने मुख्य हमलावर दस्ते-पिपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी(पीएलजीए) को और मजबूत बनाने की दिशा में नक्सली काम कर रहे हैं।
पीएलजीए की हालिया गतिविधियों से उत्साहित होकर भाकपा माओ ने जगह-जगह भर्ती सेंटर बना कर युवकों को इसमें शामिल कराने का अभियान छेड़ने की घोषणा की है। इस संबंध में भाकपा माओ की पूर्वी रिजनल कमांड ने व्यापक रणनीति बनाई है।

संगठन से मिले संकेतों के अनुसार इस रणनीति के तहत पहला अभियान भाकपा माओ के प्रभाव क्षेत्र में 2 दिसंबर से 11 दिसंबर तक चलाया जाएगा। अपने समर्थकों को गोलबंद करने के लिए संगठन ने इन दस दिनों को पीएलजीए दिवस घोषित करते हुए अपने तमाम विंग से इस दौरान प्रभावी आक्रामक कार्रवाईयों के साथ साथ सांगठनिक विश्वास के लिए बैठकें करने, सांस्कृतिक कार्यक्रम करने, सैन्य परेड आदि कार्यक्रम किए जाने की घोषणा की है।

संगठन का मानना है इससे उसके समर्थकों में जोश आएगा और वे अपनी ओर आम लोगों को आकृष्ट कर सकेंगे। दरअसल संगठन पीएलजीए को सशक्त बनाने में जुटा है। हाल में जारी एक बयान में पीएलजीए को संगठन के लिए बेहद जरूरी बताते हुए इसके विस्तार की बात कही गई थी।

संगठन का मानना है कि गिरीडिह में कैदी वैन पर हमला, जाजापुर कैंप पर हमला, पाकुड़ एसपी की हत्या, पारसनाथ में सीआरपीएफ पर हमला, संथाल परगना में सीआरपीएफ पर हमला, विश्रामपुर में टीपीसी के दस्ते का सफाया, घाटशिला में कोबरा पर हमला संगठन के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण रहा है।

संगठन ने इसे आपरेशन ग्रीन हंट और कोबरा कार्रवाईयों का जनवादी जवाब घोषित किया है। इसलिए संगठन का पूरा फोकस पीएलजीए को मजबूत करने पर है। नई रणनीति में अपने जनाधार को बढमने पर भी चर्चा की गई है। माओवादी आम जनों के बीच में अपनी छवि अच्छी बनाना चाहते हैं। इसके लिए संगठन के लोगों को आम जनों के साथ नम्रता से पेश आने और श्रद्धा से बातें करने की नसीहत दी गई है। साथ ही पूरा जोर जनता के साथ दोस्ताना संबंध बनाने पर है।

माओवादी झारखंड जैसे इलाके में खनिज संपदा के दोहन और जल-जंगल-जमीन जैसे मुद्दे उभार कर और स्थानीय लोगों के अधिकार की बात कह कर व्यापक गोलबंदी करना चाह रहे हैं। संगठन का मानना है कि ऐसा करने से पीएलजीए में भारी संख्या में नए रंगरूट बहाल होंगे और बिहार-झारखंड में चल रहे गुरिल्ला युद्ध को एक पूरी तरह चलायमान युद्ध में बदला जा सकता है।

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