DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

दुनिया की राजनीति में तेल का खेल

तेल उत्पादक और निर्यातक राष्ट्र संगठन (ओपेक)  पहले जहां एकजुट था,  आज वहीं यह एक ‘बंटा हुआ घर’ है। सर्वसम्मति से फैसला करने और उसे लागू करने का दौर अब बीते समय की बात हो गया है। अब इसमें सऊदी अरब और कुवैत जैसे बड़े तेल उत्पादकों व संपन्न देशों की आवाजें ही सुनी जाती हैं। 12 सदस्य देशों में सऊदी अरब व कुवैत का पलड़ा ईरान व वेनेजुएला के मुकाबले कहीं अधिक भारी होता है,  जबकि ईरान व वेनेजुएला तेल के अपेक्षाकृत बड़े उत्पादक देश हैं और वेनेजुएला में तो तेल के सबसे ज्यादा भंडार हैं। वहां के राष्ट्रपति के हस्तक्षेप के बावजूद तेल के उत्पादन में कटौती नहीं की गई। ईरान और वेनेजुएला चाहते थे कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम 80 डॉलर प्रति बैरल तुरंत हो जाए,  जबकि लक्ष्य 110-120 डॉलर प्रति बैरल ले जाने का था। ये दोनों ही देश अपेक्षाकृत गरीब हैं और काफी हद तक उनकी अर्थव्यवस्था तेल पर निर्भर है। साथ ही,  ये देश राजनीतिक रूप से अस्थिर माने जाते हैं। उनकी ज्यादातर सामाजिक कल्याण नीतियां तेल के पैसे से ही चलती हैं।

ऐसे में,  पूंजी के अभाव में वहां राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है। दूसरी तरफ, सऊदी अरब और कुवैत ‘डीप पॉकेट्स’ यानी भारी धन भंडार वाले देश हैं, इनके पास नकदी का प्रवाह अधिक है और ये चार-पांच महीने घाटे को बर्दाश्त कर सकते हैं। लेकिन क्यों?  दरअसल, अमेरिका काफी हद तक ऊर्जा के मामले में स्वतंत्र हो चुका है,  आयातित तेल पर उसकी निर्भरता सिर्फ 50 फीसदी रह गई है। यह इसलिए कि हाल के समय में अमेरिका में सेल तेल और सेल गैस क्रांति हुई। हजारों लोग इस क्रांति में शामिल हैं,  जो छोटे किसान या लघु उद्योगपति हैं। अमेरिका में जमीन का मालिक ही जमीन के नीचे की संपदा का मालिक होता है,  जबकि भारत में जमीन के नीचे की संपदा सरकार की होती है। जब वहां के किसानों को मालूम चला कि उनकी जमीन के नीचे तेल-संपदा है,  तो वे उद्योगपति बन गए। लेकिन सेल गैस व तेल का लागत मूल्य काफी अधिक है। सऊदी अरब में तेल की प्रति बैरल लागत 25 डॉलर से भी कम है। वहीं अमेरिका में यह प्रति बैरल कम से कम 50 डॉलर है। ओपेक का प्रयास कहीं न कहीं तेल की कीमत को 60 डॉलर प्रति बैरल रखने का है,  जिससे सेल-क्रांति धराशायी हो जाए।

हालांकि,  तेल के मामले में अमेरिकी प्रशासन का हस्तक्षेप इतना आसान नहीं है। लेकिन तेल के दाम 60 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहे,  तो ओबामा प्रशासन इसे गिरने से रोकने का प्रयास करेगा,  क्योंकि अमेरिका की अर्थव्यवस्था में जो वसंत आया है,  वह काफी हद तक सस्ते तेल,  यानी सेल की देन है। तेल के खेल में हमेशा ही 90 फीसदी राजनीति रही है। साल 1920 से लेकर आज तक जितने युद्ध हुए हैं,  चाहे वह दूसरा विश्व युद्ध हो,  या पहला खाड़ी युद्ध या फिर दूसरा खाड़ी युद्ध,  या फिर आज के समय की यूक्रेन समस्या या ईरान संकट की बात हो,  सब जगह असल कारण तेल रहा। यह साफ हो चुका है कि तेल की कीमत मांग-आपूर्ति से तय नहीं होती,  बल्कि उसके पीछे कूटनीति,  राजनीति,  संघर्ष व खुफियागिरी होती है। इसके अलावा,  सैन्य तिकड़मबाजी भी देखने को मिलती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि दुनिया के तेल-क्षेत्र में वह सब कुछ होता है,  जो रक्षा क्षेत्र में होता है।

वहीं,  सऊदी अरब और ईरान के बीच टकराव भी है। कच्चे तेल के दाम गिरने से ईरान कमजोर पड़ता जाएगा, जो कहीं न कहीं सऊदी अरब और अमेरिका के लिए अच्छी स्थिति होगी। कमजोर ईरान पश्चिम के सामने घुटने टेक देगा और आणविक संधि पर हस्ताक्षर कर,  परमाणु हथियार बनाने का अपना हठ त्याग देगा। इससे यह जाहिर होता है कि तेल को लेकर भले ही अमेरिका और सऊदी अरब में टकराव की स्थिति हो,  लेकिन ईरान को लेकर ये दोनों देश एक साथ खड़े हैं। ओपेक के बाहर रूस के लिए भी तेल की कीमत समस्याएं बढ़ाती हैं। इस देश की अर्थव्यवस्था भी तेल व गैस पर निर्भर है। रूस का दो-तिहाई तेल पश्चिम के देशों को जाता है। जी-20 की बैठक में जाने से पहले रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा था कि सस्ता तेल रूस की अर्थव्यवस्था के लिए मुसीबत बन गया है। पिछले दिनों उसको 30 बिलियन डॉलर का घाटा हो चुका है।

इस समय में जब यूक्रेन के मुद्दे पर पश्चिमी देशों ने रूस पर कई प्रतिबंध लगा रखे हैं,  तब तेल की कीमतों का गिरना उसके लिए सिरदर्द है। अगर यह सिलसिला यों ही चलता रहा,  तो पश्चिम से लड़ने का रूस का सामर्थ्य कमजोर होता जाएगा, पश्चिम भी यही चाहता है। सत्तर के दशक के बाद पहली बार तेल का क्षेत्र बुनियादी और ढांचागत बदलावों के दौर से गुजर रहा है। चाहे दुनिया में राजनीतिक शीत युद्ध न हो, पर तेल के क्षेत्र में देशों के बीच शीत युद्ध जारी है। मेरा मानना है कि यह दो-तीन वर्षों तक चलेगा। जब यह समाप्त हो जाएगा,  तब नई अंतरराष्ट्रीय तेल व्यवस्था का जन्म होगा। उसके बाद तेल महंगा हो जाएगा और तेल उत्पादक देशों की पकड़ और मजबूत होगी।

वहीं,  भारत और चीन जैसे बड़े तेल आयातक देशों का भी इसमें दखल बढ़ेगा कि तेल की क्या कीमत होनी चाहिए। 2014 ग्लोबल वार्मिंग के हिसाब से सबसे गरम साल रहा है। ऐसे में,  सस्ता तेल,  राजनीतिक गरमी और पृथ्वी का बढ़ता हुआ तापमान विश्व के नए राजनीतिक मुद्दे बन गए हैं। भारत जैसे देशों को इन मुद्दों के प्रति सतर्क रहना होगा, क्योंकि यहां मध्यवर्ग के विस्तार के साथ तेल की खपत बढ़ी है। हालांकि,  ग्लोबल वार्मिंग की वजह पश्चिम के देश हैं, पर वे अंकुश भारत और चीन पर लगाना चाहते हैं। आज हमारे देश में तेल सस्ता हो रहा है और इस मौके को गंवाना नहीं चाहिए। हमें एक रास्ता मिला है कि अगले एक-डेढ़ साल तक तेल के दाम कम रहेंगे। इसलिए भारत को पूरे तेल क्षेत्र के अंदर आधुनिकीकरण को अंजाम देना होगा। पुरानी की जगह नई तकनीक अपनानी होगी। हमारे पेट्रोल पंप पुरानी पीढ़ी के हैं,  उनको  बदलना होगा। देश के अंदर तेल-खनन धीमी गति से होता है, उसको बढ़ाना होगा। इसके अलावा, वैकल्पिक ऊर्जा को तेजी से प्रोत्साहित करना होगा।

ऊर्जा की खपत प्रति व्यक्ति सबसे कम करने वाले देशों में भारत शामिल है। हमारे लिए जरूरी है कि सौर-ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल-विद्युत ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा और टाइडल एनर्जी व अन्य स्रोतों का तेजी से विकास हो,  ताकि आयातित तेल पर निर्भरता, जो 80 फीसदी है,  कम कर सकें और ऊर्जा-स्वतंत्र देश बनने के अपने लक्ष्य को हासिल कर पाएं। इसमें वर्तमान सरकार अपने मुद्दे से आगे बढ़ती है,  तो देश की अर्थव्यवस्था के लिए यह वास्तव में अच्छी खबर होगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:दुनिया की राजनीति में तेल का खेल