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साख को बट्टा

सेंट लुईस की ग्रैंड ज्यूरी के इस फैसले के बाद कि डेरेन विल्सन के खिलाफ क्रिमिनल अभियोग नहीं चलाए जाएंगे, अमेरिका में तीखी बहस छिड़ गई और यह बहस साबित करती है कि नस्लवाद के मामले में अमेरिका काफी कुछ बदला है,  मगर बहुत कुछ नहीं भी बदला है। गौरतलब है कि गोरे पुलिस अधिकारी डेरेन विल्सन ने एक निहत्थे काले किशोर माइकल ब्राउन को गोली मार दी थी। बहरहाल,  ज्यूरी के फैसले के छह दिनों के बाद भी यह मसला सुर्खियों में छाया हुआ है। नस्लवाद और कानून लागू करने को लेकर अमेरिका में एक तीखा विवाद उठ खड़ा हुआ है और काले लोग चीख-चीखकर यह इल्जाम लगा रहे हैं कि गोरों के दबदबे वाली पुलिस गैर-कानूनी तरीके से उन्हें निशाना बनाती है। विल्सन गोरे हैं और ब्राउन काले थे। इसलिए नस्ली रिश्तों के हर पहलू पर बहस हो रही है और चंद मिनटों में उसके टुकड़े-टुकड़े किए जा रहे हैं। ज्यूरी के फैसले के बाद अमेरिका में दंगे भड़क गए और पूरे देश में इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन अब भी जारी हैं।

बहरहाल,  रविवार को विल्सन ने,  जो अब कई लोगों की नफरतों के केंद्र बन गए हैं,  अपने इस्तीफे की घोषणा कर दी। दरअसल,  पुलिस महकमे ने उन्हें बताया था कि अगर वह विभाग में बने रहते हैं,  तो हिंसा फैसले का खतरा है। फर्गसन मामले ने समूचे अमेरिका को झकझोर दिया है,  और राष्ट्रपति बराक ओबामा के आगे भी एक बड़ी चुनौती पेश कर दी है। लेकिन इसका एक अन्य दुखद पहलू भी है,  जिस पर गौर करने की जरूरत है। इस मामले ने पूरी दुनिया में अमेरिका की छवि धूमिल की है। अमेरिका हमेशा ही खुद को एक आदर्श के तौर पर पेश करता रहा है कि उसका आईन बराबरी,  इंसाफ और कानून के राज की ठोस बुनियादों पर खड़ा है।.. एक ऐसे दौर में,  जब अमेरिका के सुपरपावर को चीन की तरफ से गंभीर चुनौती मिल रही है,  तब इस नस्लवादी विवाद से उसकी मुश्किलें और बढ़ जाएंगी। इसलिए वाशिंगटन को अपनी साख को लगी खरोचों को रफू करते की तुरंत कोशिश करनी चाहिए, ताकि दुनिया के मंच पर वह अपना असरदार रोल अदा करता रहे।  
द पेनिनसुला, कतर

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