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प्रकृति के शत्रु नहीं, अंश हैं हम

संपूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं और अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है। और वृष्टि यज्ञ से होती है। और यह यज्ञ कर्मों से उत्पन्न होने वाला है। इस सूत्र को समझने के लिए कुछ और बातें भी भूमिका के रूप में समझनी जरूरी हैं। पूर्व और पश्चिम के दृष्टिकोण में एक बुनियादी फर्क है। और चूंकि आज सारी दुनिया ही पश्चिम के दृष्टिकोण से प्रभावित है- पूर्व भी- इसलिए सूत्र को समझना बहुत कठिन हो गया है। पूर्व ने सदा ही प्रकृति को और मनुष्य को दुश्मन की तरह नहीं लिया,  मित्र की तरह लिया। ‘कॉन्करिंग दि नेचर!’  पश्चिम में प्रकृति और आदमी के बीच बुनियादी शत्रुता की दृष्टि है,  इसलिए वे कहते हैं- जीतना है प्रकृति को। अब मां को कोई जीतता नहीं। लेकिन पश्चिम में प्रकृति तथा जीवन और जगत व मनुष्य के बीच एक शत्रुता का भाव है- जीतना है, लड़ना है, हराना है।

बर्ट्रेंड रसेल की एक किताब है,  ‘कॉन्क्वेस्ट ऑफ नेचर।’ पश्चिम का कोई दार्शनिक लिख सकता है- प्रकृति की विजय। लेकिन कोई कणाद,  कोई कपिल,  कोई महावीर,  कोई बुद्ध,  कोई कृष्ण,  पूर्व का कोई भी दार्शनिक नहीं कह सकता, प्रकृति की विजय,  क्योंकि हम प्रकृति के ही तो हिस्से हैं,  अंश हैं। उसकी विजय हम कैसे करेंगे? वह विजय वैसा ही पागलपन है,  जैसे मेरा हाथ सोचे,  शरीर की विजय कर ले। जीतने की भाषा ही खतरनाक है। लेकिन पश्चिम द्वंद्व (कॉन्फ्लिक्ट) की भाषा में सोचता है। वह सोचता है- प्रकृति और हम दुश्मन हैं। यह बड़े आश्चर्य की बात है!

इस सूत्र के लिए मैं यह क्यों कह रहा हूं कि यह समझ लेना जरूरी है?  यह समझ लेना इसलिए जरूरी है कि जब लोग अत्यंत सरल भाव से भरते हैं तथा जीवन को और अपने को तोड़ कर नहीं देखते- कोई खाई नहीं देखते- तो फिर उस स्थिति में सब कुछ परिवर्तित होता है और ढंग से। जैसे कृष्ण कहते हैं- अन्न से बनता है मनुष्य। हम कहेंगे, अन्न से?  बड़ी भौतिकवादी बात कहते हैं कृष्ण। और कृष्ण जैसे आध्यात्मिक व्यक्ति से ऐसी बात! फिर वह पश्चिम का दृष्टिकोण दिक्कत देता है। असल में पश्चिम कहता है कि यह सब पदार्थ है। पूर्व तो कहता ही नहीं कि पदार्थ कुछ है। पूर्व तो कहता है, सभी कुछ परमात्मा है। अन्न भी जीवंत परमात्मा है।

इसलिए कृष्ण जब कहते हैं कि अन्न से निर्मित होता है मनुष्य,  तो कोई इस भूल में न पड़े कि वे वही कह रहे हैं, जैसाकि भौतिकवादी कहता है कि बस खाना-पीना,  इसी से निर्मित होता है;  मिट्टी, पदार्थ,  तत्व,  इन्हीं से निर्मित होता है। वे यह नहीं कह रहे हैं। यहां वे यह कह रहे हैं कि अन्न से निर्मित होता है मनुष्य;  और जब अन्न से मनुष्य निर्मित होता है तो अन्न भी जीवंत है,  जीवन है। और अन्न आता है वर्षा से। वर्षा न हो, तो अन्न न हो। यहां वे जोड़ रहे हैं जीवन और प्रकृति को गहरे में। और वर्षा कहां से आती है? अब वर्षा कहां से आती है? कृष्ण कहते हैं यज्ञ से। वैज्ञानिक कहेगा,  बेकार की बात कर रहे हैं!  वर्षा और यज्ञ से? वह कहेगा कि वर्षा यज्ञ से नहीं आती,  वर्षा बादलों से आती है। लेकिन कृष्ण पूछना चाहेंगे कि बादल कहां से आते हैं?  विज्ञान उत्तर देता चला जाएगा- समुद्र से आता है, नदी से आता है। लेकिन अंतत: सवाल यह है कि क्या मनुष्य में और आकाश में चलने वाले बादलों के बीच कोई आत्मिक संबंध है या नहीं है?

कृष्ण जब कहते हैं कि वर्षा आती है यज्ञ से,  तो वे यह कह रहे हैं कि वर्षा और हमारे बीच भी संबंध है। वर्षा हमारे लिए आती है;  हमारी कामनाओं,  हमारी आकांक्षाओं,  हमारी भूख,  हमारी प्यास को पूरा करने आती है। वे यह कह रहे हैं कि हमारी प्रार्थनाएं सुन कर आती है। समझने की बात सिर्फ इतनी है कि प्रकृति और मनुष्य के बीच कोई लेन-देन है, कोई कम्युनिकेशन है या नहीं है?     
साभार: ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन,  नई दिल्ली

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