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भाजपा का द्वंद्व

अलग चाल, चरित्र व चेहरा होने का दम भरने वाली भारतीय जनता पार्टी अंदरूनी मतभेदों के भंवर में फंसी प्रतीत होती है। पार्टी में खेमेबंदी से उसकी एकाुटता पर प्रतिकूल प्रभाव तो पड़ा ही है, कुछ महत्वपूर्ण मसलों पर उसके दो अलग-अलग स्वर भी सामने आए हैं। इसकी एक ताजा झलक प्रस्तावित भारत-अमेरिकी परमाणु सहयोग समझौते के बार में पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी और पूर्ववर्ती राजग सरकार में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे चुके ब्रजेश मिश्र के विरोधाभासी बयानों में देखी जा सकती है। आडवाणी व पार्टी के अन्य नेता परमाणु करार का विरोध कर रहे हैं, जबकि मिश्र का मानना है कि करार देश-हित में है, और संप्रग सरकार को इस पर आगे बढ़ना चाहिए। आडवाणी का तर्क है कि करार के बाद भविष्य में परमाणु परीक्षण करने का कोई अधिकार भारत के पास नहीं रहेगा। इससे देश की सामरिक स्वायत्तता, उसके सैनिक परमाणु कार्यक्रम व स्वतंत्र विदेशनीति पर असर पड़ेगा। पर, मिश्र का मत है कि करार से न तो सामरिक कार्यक्रम पर आंच आएगी, न ही हम परमाणु परीक्षण का अधिकार खोएंगे। परस्पर-विरोधी बयानों के आने के बाद भाजपा ने सफाई दी है कि पार्टी की राय का मिश्र प्रतिनिधित्व नहीं करते। लेकिन, यह वही मिश्र हैं, जो राजग सरकार की विदेशनीति के नियोजन में सर्वाधिक प्रभावशाली व्यक्ित थे। तब इसी तरह के परमाणु समझौते के बार में अमेरिका के साथ लंबी बातचीत चली, व सभी संकेत इशारा करते हैं कि आज से कहीं अधिक कड़ी शर्तो के साथ यह करार करने को राजग सरकार सहमत थी। वर्तमान में मिश्र भाजपा के सदस्य नहीं हैं, पर तथ्यों के उाास में यह सिर्फ तकनीकी मुद्दा है, और उसके पार जाकर देखें तो यही लगता है कि सत्ता से बाहर होने पर पार्टी ने अपना रंग बदल दिया है। अपने सैद्धांतिक रुख पर कायम रहने के बजाय वह अवसरवादी राजनीति कर रही है। इस रुख पर स्वयं अमेरिकी नेता (किसिंजर आदि) हैरान हैं और आडवाणी को मनाने के लिए उनसे मिल भी चुके हैं। उर्दू शिक्षकों की नियुक्ित हो या आर्थिक नीतियां, राजग में रहते हुए भाजपा कुछ और कहती रही और विपक्ष में बैठने पर उसके तेवर कुछ और बयां करते हैं। बेहतर होगा कि भाजपा साफ शब्दों में अपनी परमाणु नीति का खुलासा कर, वर्ना मतदाताओं के बीच उसके असली रुख को लेकर छाई धुंध उसकी साख को कमजोर ही करगी।ं

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  • Web Title: भाजपा का द्वंद्व