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राहुल के कंधे और कांग्रेस का भार

संदेह अब खत्म हो चुका है। अब यह रहस्य नहीं है कि अगले आम चुनाव में कांग्रेस की अगुवाई कौन करगा। हालांकि इसका टाइम टेबल अभी भी छिपाया जा रहा है, लेकिन बाजी बिछ चुकी है। उड़ीसा के आदिवासी इलाके से लेकर बुंदेलखंड तक और फिर कर्नाटक के पश्चिम तट से महाराष्ट्र के विदर्भ तक राहुल गांधी की यात्राओं के बाद अब कोई संदेह रहना भी नहीं चाहिए। हालांकि असल सवाल यह नहीं है कि वे कहां जा रहे हैं। असल सवाल है कि यह रास्ता उन्हें दिल्ली की सत्ता तक कैसे ले जाएगा। अभी यह शुरुआत है, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि इसका असर उनकी पार्टी पर या जनता पर क्या पड़ेगा। लेकिन कुछ संकेत जरूर सामने आए हैं। उत्तर प्रदेश जसे बड़े प्रदेश में एक पार्टी के तौर पर कांग्रेस 10 में ही लुप्त हो गई थी। अब यहां ठीक-ठाक किस्म का खिलाड़ी बनने के लिए उसे लंबी यात्रा करनी होगी। इस सब पर मुख्यमंत्री मायावती की प्रतिक्रिया पर कांग्रेस ने ध्यान तक नहीं दिया है। लेकिन इस बात को समझ पाना आसान नहीं है कि केंद्र सरकार ने बुंदेलखंड को बदहाली से उबारने के लिए 80,000 करोड़ रुपए के पैकेा को हरी झंडी क्यों नहीं दिखाई। उत्तर प्रदेश का मामला इसलिए भी कठिन है कि वहां ऐसी एक पूरी पीढ़ी सामने आ गई है, जो कांग्रेस शासनकाल के माहौल में पली-बढ़ी है। राहुल और सोनिया के दौरों का असर कितना सतही था, वह हाल ही में हुए उपचुनाव के नतीजों में देखा जा सकता है। या फिर 2007 के चुनाव नतीजों में भी। तब कांग्रेस को अमेठी, रायबरली और प्रतापगढ़ जसे अपने परंपरागत गढ़ में मात मिली थी। लेकिन कुछ अन्य राज्यों में स्थिति बिलकुल अलग है, जहां लंबे समय से विपक्षी दलों का शासन है। ये ऐसे राज्य हैं, जहां कुछ हद तक गरीब तबका अभी भी पार्टी के प्रति वफादार है। उड़ीसा में नवीन पटनायक की सरकार अगले बरस अपने दस साल पूर कर रही है। 2006 में जब कलिंग नगर में भीड़ पर पुलिस ने गोलियां बरसाई थीं, तो सोनिया गांधी वहां गई थीं। राहुल की यात्रा में वहां के प्रतिष्ठित संगठन ग्राम विकास परिषद ने भी सहयोग किया है। उड़ीसा इंदिरा गांधी के लिए भी खासा महत्वपूर्ण रहा है। यहीं पर उन्होंने 30 अक्तूबर 1ो अपनी आखिरी जनसभा की थी। यही वह क्षेत्र है जहां 2006 के वन अधिकार अधिनियम का फायदा सबसे ज्यादा परिवारों को मिला है। अब कांग्रेस के लिए वहां सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपनी मशीनरी को सक्रिय कर और खुद के बनाए गए कानून के फायदों को वोट की ताकत में बदले। यही वह मोर्चा है जिस पर राहुल गांधी को सबसे बड़ी मुश्किल का सामना करना पड़ेेगा। ऐसी मुश्किल जिसका सामना पार्टी की बागडोर संभालने वाले उनके परिवार के किसी भी सदस्य को नहीं करना पड़ा। 1में जवाहर लाल नेहरू ने जब पार्टी की बागडोर संभाली तो उनके पास महात्मा गांधी का आशीर्वाद था। उन्होंने जिस तरह देश के नौजवानों के सपनों पर असर डाला वैसा असर उनके पहले सिर्फ सुभाष चंद्र बोस ने ही डाला था। लेकिन इंदिरा गांध्ीा का रास्ता इतना आसान नहीं था। उन्हें सत्ता विरासत में मिली भी नहीं थी। उन्हें एक सिंडीकेट ने सत्ता में पहुंचाया था। बाद में उन्होंने अपनी बनाई और विरोधियों को किनार कर दिया। और इसी के बाद से कहानी बदल भी गई। 1में इंदिरा गांधी ने आपत्काल लगाया और अपने पुत्र संजय गांधी की प्राण प्रतिष्ठा की। हालांकि कुछ साल बाद संजय गांधी का निधन हो गया, लेकिन इस बीच उन्होंने कांग्रेस का चेहरा पूरी तरह बदल दिया था। राजीव गांधी के साथ शुरुआत में अच्छी बात यह थी कि उन पर राजनीतिज्ञ वाला बिल्ला नहीं लगा था। मोती लाल नेहरू के बाद वे परिवार के अकेले ऐसे राजनीतिज्ञ थे जो एक सफल प्रोफेशनल कैरियर छोड़कर आए थे। उन्होंने इंडियन एयरलाइंस से बोइंग पॉयलट की नौकरी छोड़कर राजनीति की राह पकड़ी। राजीव गांधी और संजय गांधी को पार्टी की बागडोर संभालने के लिए उस समय तैयार किया गया था जब भारतीय राजनीति में कांग्रेस का बोलबाला था। उसे चुनौती देने वाला कोई बड़ा दलित राजनीतिक दल नहीं था। तमिलनाडु और पंजाब को छोड॥कर क्षेत्रीय दल कहीं भी अच्छी स्थिति में नहीं थे। और इंदिरा गांधी के पूर कार्यकाल में हिन्दुत्व की बात करने वाली पार्टी कभी मुख्यधारा का बड़ा दल नहीं बन सकी। लेकिन इंदिरा के बाद का इंडिया बदल चुका है। 1े अलावा पार्टी को कभी पूर्ण बहुमत नहीं मिला। 2004 में उसने गठाोड़ से सरकार बनाई और अभी भी देश राजन्ीतिक एजेंडा तय करने के लिए संघर्ष कर रही है। राहुल गांधी का काम इसीलिए मुश्किल है। उन्हें उस समय पार्टी में नई जान फूंकनी है जब वे और उनकी मां दोनों के पास सरकार का कोई पद नहीं है। ऐसे में प्रधानमंत्री न होने से बड़ा फर्क पड़ता है। मसलन इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि इंदिरा गांधी के कार्यकाल में महासचिव के तौर पर राजीव गांधी ने कई नीतियों को प्रभावित किया था। यह सब मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते भी मुमकिन है, लेकिन इसके लिए अतिरिक्त प्रयास की जरूरत होगी। लेकिन सबसे गंभीर बात यही है कि पार्टी के पास अब वैसी मशीनरी नहीं रही, जसी दो दशक पहले तक थी। पिछले एक दशक से जब से सोनिया गांधी के हाथों में पार्टी की बागडोर है, राज्यों में नए नेतृत्व को आगे लाने की कोई कोशिश नहीं हुई। शायद यह सब राहुल के लिए छोड़ दिया गया था। राहुल की दिक्कत यह है सरकार के उनके ज्यादातर मंत्री पुरानी पीढ़ियों के हैं। एक तरफ अजरुन सिंह हैं, जो आधी सदी पहले राजनीति में आए थे, दूसरी तरफ पी. चिदंबरम् हैं, जिन्हें उनके पिता राजनीति में लाए थे। उनकी अपनी पीढ़ी के लोग इस खेल के लिए बहुत नए हैं। भारत जवान हो रहा है, यह एक ऐसा देश है जहां दस में से सात लोग चालीस साल से कम उम्र के हैं। राहुल को इन्हीं लोगों से संवाद बनाना है। बिना उस पुरानी पीढ़ी को अलग-थलग किए जो उनकी मां के नाम पर इतने समय से देश चला रहे हैं। दूसरी तरफ कें द्र सरकार भी कई परशानियों में फंसी है। कीमतें बढ़ रही हैं और किसान उससे बुरी तरह नाराज हैं। इसमें कुछ भी नया नहीं है। 10 और 10 के दशक में भी स्थिति इतनी ही खराब थी। लेकिन इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने इन सब बाधाओं को पार कर ही लिया था। उन्होंने पार्टी में जान डालने के लिए सरकार का इस्तेमाल किया था। और गरीबी हटाओ जसे नारों ने सब कुछ बदल दिया था। लेखक इतिहासकार और राजनीतिक समीक्षक है

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  • Web Title: राहुल के कंधे और कांग्रेस का भार