DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

मुझ सा बुरा न कोय

ब्रह्मा जी से एक बार इंसान ने पूछा, ‘मैं सदा उन्नति करना चाहता हूँ। सुख-शांति चाहता हूँ। क्या करूँ?’ ब्रह्मा जी ने उसे दो गठरियां थमाईं और बोले, ‘एक गठरी में तुम्हार पड़ोसी की बुराइयां हैं। इसे पीठ पर लादो और भूल कर भी मत खोलना। न देखना, न दूसरों को दिखाना। दूसरी गठरी में तुम्हार दोष हैं। उसे सामने छाती पर लटका लो और बार-बार खोल कर देखते रहना।’ उसने भूलवश अपनी बुराइयों से भरी गठरी को पीठ पर लाद लिया। पड़ोसी की बुराइयों भरी गठरी का मुंह खुला छोड़ कर आगे की तरफ लटका लिया। उसे वह सार रास्ते खुद भी देखता रहा और दूसरों को भी दिखाता रहा। बस वह उन्नति की बजाय अवनति की राह पर भटक गया। खुद का आईना, खुद की पुलिस और खुद का गुरु बनिए। हमेशा विद्यार्थी सीखते हुए आगे बढ़िए। यही जीवन में कामयाबी का मूलमंत्र है। इससे खुद दुरुस्त हो जाएंगे। सुधार निरंतर जारी रहता है। वास्तव में, यह एक नई शुरुआत है। दोपहर के वक्त हारत अकरम ने जंगल में पड़ाव डाला। खाना बनाने के लिए ईंधन का इंतजाम करना था। आसपास झाड़ियां नहीं थीं। लकड़ियों का मिलना मुश्किल था। कुछ सोच-विचार कर हारत ने सभी साथियों को आदेश दिया, ‘लकड़ियों के छोटे-छोटे टुकड़े, तिनके वगैरह इकट्ठे कर लाओ।’ सभी जंगल में यहां-वहां लकड़ियां बटोरने लगे। लौटे तो लकड़ियों का ढेर लग गया। ढेर की ओर संकेत करते हुए हारत अकरम बोले, ‘देखो, ध्यानपूर्वक खोजने से लकड़ियों का ढेर लग गया है। इसी प्रकार, अगर इंसान अपनी छोटी-छोटी गलतियों-भूलों का आत्ममंथन कर, तो वे ढेर सी नजर आएंगी। जसे इन लकड़ियों को जला कर हम भोजन पका रहे हैं, उसी प्रकार अपनी तमाम बुराइयों को नष्ट कर हम अपने तन-मन को स्वस्थ बना सकते हैं।’

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: मुझ सा बुरा न कोय