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राजरंग

इश्क मुआ चीज है एसी है, इसका क्या कहिये। इसमें बस आंखें ही चलती हैं, जुबां कहां चलती। चलती भी है, तो दिल की जुबां। चाहनेवाले एक दूसर को आंखों ही आंखों से जी भरकर देख लेते हैं और सब कुछ समझ जाते हैं। दिल की कोई जुबां तो बोल नहीं पाती, इसलिए असली जुबां पर ताले लग जाते हैं। बरसों-बरस से यही कहानी चली आ रही है। आज भी कहानी बदली नहीं है। अब कल की बात लीजिये। इश्क, प्यार और प्रीत का एक ताजा तरीन उदाहरण। दिल्ली के गोर छोर और झारखंडी गुरु की। दोनों हवाई मार्ग से देश की राजधानी से अपने सूबे की राजधानी आ रहे थे। पहले तो दोनों एक-दूसर से काफी देर तक नजरं चुराते रहे। जब नजरं मिलीं, तो पहचानने से इंकार कर दिया। अब दोनों के दिल में एक-दूसर के प्रति प्रेम तो किसी से छिपा नही हैं। दोनों एक-दूसर को किस कदर दिलोजान से चाहते हैं, पूरा झारखंड इसे जानता है। लेकिन उनका प्यार भी यह बेरहम दुनिया बर्दाश्त नहीं कर रही। नजरं चुरानेवालों ने आंखों ही आंखों में एक दूसर को सिर्फ इतना ही इशारा किया- दगा नहीं देना जी, दगा नहीं देना, जमाना खराब है ..। अब तो आप समझ ही गये न..।

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