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दो टूक

देश भर के बिजलीघरों के लिए अपनी धरती का सीना चीरकर कोयला देने वाला झारखंड बिजली के लिए त्राहि-त्राहि कर रहा है। बच्चों की पढ़ाई लिखाई की किसे सुध, कल कारखानों में मुर्दनी छा गयी है। खान खोदेंगे तो पर्यावरण बिगड़ेगा ही। भीषण गर्मी के प्रकोप से कंक्रीट के पिंजड़ों में सिमटती गयी कसमसाती आबादी की कोई सुनने वाला नहीं। सुने कौन! जवाबदेह अफसर-हुक्मरान तो साउन्डप्रूफ एसी कमरों में आराम फरमाते हैं। उनके जेनेरटरों के लिए सरकारी खजाना हमेशा खुला होता है। चाबी जो उनके पास है।

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