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लिवर को संभालें

लिवर को हम अंग और ग्रंथि, दोनों  ही कह सकते हैं। यह शरीर की पांच सौ से अधिक अतिमहत्वपूर्ण गतिविधियों में भाग लेता है। कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा के पाचन में भी लिवर की बड़ी भूमिका है। यह शरीर का इकलौता अंग है, जो क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को आसानी से बदल सकता है। लेकिन अगर  यह अधिक संख्या  में क्षतिग्रस्त हो गई हों तो उसकी भरपाई करना संभव नहीं होता।  लिवर के 75 प्रतिशत ऊतकों के प्रभावित होने पर यह ठीक से काम करना बंद कर देता है और यह स्थिति रोगी के लिए घातक होती है।

लिवर के प्रमुख रोग
हेपेटाइटिस: वायरस से होने वाला हेपेटाइटिस लिवर की बीमारियों का दूसरा सबसे बडम कारण है। हेपेटाइटिस-ए अधिकतर बच्चों और हेपेटाइटिस-ई वयस्कों को होता है। साफ-सफाई का अभाव, दूषित भोजन व पानी का सेवन तथा संक्रमित बॉडी फ्लूइड का संपर्क इसका कारण बनते हैं। यह  प्रमुख रूप से पांच प्रकार का होता है, हेपेटाइटिस-ए, हेपेटाइटिस-बी, हेपेटाइटिस-सी, हेपेटाइटिस-डी और हेपेटाइटिस-ई। हेपेटाइटिस-ए और सी के संक्रमण को सबसे गंभीर माना जाता है। वायरस-बी असुरक्षित यौन संबंधों के कारण होता है या मां से नवजात शिशु में भी स्थानांतरित हो सकता है। वायरस-ए और वायरस-बी को वैक्सिनेशन से रोका जा सकता है।

फैटी लिवर : फैटी लिवर की स्थिति तब आती है, जब  लिवर में वसा का जमाव हो जाता है। अगर वसा 5 से लेकर 10 प्रतिशत से अधिक है, तब इसे लिवर डिजीज कहा जाएगा। अकसर इसके कोई लक्षण  दिखाई नहीं देते।  10 से 20 प्रतिशत लोगों में फैटी लिवर की समस्या देखी जाती है। यह 50 से 60 वर्ष वाले आयु वर्ग के लोगों में अधिक पाई जाती है। लिवर में वसा का जमाव अधिक होने से कई बार यह सूज जाता है और इसकी कार्य करने की गति धीमी हो जाती है। अधिक मोटे लोगों, टाइप-2 डायबिटीज,  रक्त  में ट्राइग्लिसराइड (वसा) का उच्च स्तर, एस्प्रिन और स्टेरॉइड का अधिक मात्रा में सेवन तथा अधिक शराब का सेवन करने वालों में फैटी लिवर की समस्या अधिक होती है। 

पीलिया: लिवर में संक्रमण के कारण लाल रक्त कणिकाएं अपने चक्र को पूरा करने से पहले ही टूट जाती हैं, जिससे शरीर में बिलिरूबिन का स्तर बढ़ जाता है। इसकी गंभीरता के आधार पर इसका उपचार किया जाता है।

लिवर  कैंसर :   लिवर  का कैंसर दो प्रकार का होता है। प्राथमिक लिवर कैंसर सीधे लिवर की कोशिकाओं में पनपता है, जबकि मेटास्टैटिक कैंसर लिवर का द्वितीय कैंसर है, जो दूसरे अंगों में प्रारंभ होता है और लिवर में फैल जाता है। रसायनों जैसे कि विनाइल क्लोराइड और कार्बन ट्रेटाक्लोराइड के कारण लिवर का कैंसर हो सकता है।  जिन लोगों को डायबिटीज होती है, उनमें लिवर का कैंसर होने की आशंका अधिक होती है।

क्यों आती है लिवर में सूजन
लिवर में सूजन आने के कई कारण होते हैं..
कैंसर और इम्यून सिस्टम के उपचार के लिए दी जाने वाली दवाएं, एंटीबायोटिक और  रक्त  में कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करने वाली दवाएं भी सूजन बढम सकती हैं। एसिटामिनोफेन युक्त दर्द निवारक दवाओं का अधिक सेवन भी लिवर में सूजन का कारण बन जाता है। कई हर्बल औषधियों का दुष्प्रभाव भी लिवर में सूजन का कारण बन सकता है।

लिवर के रोगों के लक्षण
लिवर से संबंधित अधिकतर बीमारियों में कमजोरी, थकान, भार कम होना, जी मिचलाना, चक्कर आना, उल्टी होना और पेट दर्द जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। पीलिया होने पर त्वचा का रंग पीला हो जाता है। हेपेटाइटिस के कारण हुई लिवर की सूजन से पेट के दायीं ओर ऊपरी भाग में दर्द हो सकता है। कमजोर मांसपेशियों के रूप में भी इसका असर देखने को मिलता है।

उपचार का तरीका
प्राथमिक जांच में शारीरिक परीक्षण (फिजिकल इग्जामिनेशन) किया जाता है। रोग की गंभीरता के अनुसार लिवर की सूजन और कार्यप्रणाली की जांच करने के लिए ब्लड टेस्ट किया जाता है। कम्प्लीट ब्लड काउंट टेस्ट (सीबीसी) की सलाह भी दी जाती है। रोग की स्थिति के अनुसार  बोन मैरो, श्वेत रक्त कणिकाओं और प्लेटलेट्स की संख्या से लेकर रक्त  में अमोनिया के स्तर की जांच आदि की जा सकती है। लिवर और उसके आसपास की स्थिति को देखने के लिए सीटी स्कैन, एमआरआई और अल्ट्रा साउंड भी किया जाता है। जब दूसरे उपाय कारगर साबित नहीं होते, तब लिवर बायोप्सी का उपयोग करते हैं।

लिवर फेल्यर और उसके कारण
लिवर का काम न करना यानी ‘लिवर फेल्यर’ एक घातक स्थिति है। पर यह धीरे-धीरे होता है, इसलिए समय रहते उपचार से इस स्थिति को आने से रोका जा सकता है। इसके कई कारण हो सकते हैं। लिवर की कोशिकाओं में अतिशय सूजन,  मल निष्कासन में अनियमितता, लिवर में कोलेस्ट्रॉल या ट्राइग्लिसराइड का संग्रह हो जाना, लिवर  में रक्त प्रवाह बाधित होना,  लिवर के ऊतकों का क्षतिग्रस्त होना, अधिक मात्रा में एल्कोहल का सेवन,  लिवर सिरोसिस और अधिक मात्रा में विटामिन-ए का सेवन आदि प्रमुख कारण हैं।

लिवर ट्रांसप्लांट
लिवर ट्रांसप्लांट एक सर्जिकल प्रक्रिया है। अधिकतर  स्वस्थ लिवर  मृत व्यक्ित से प्राप्त किया जाता है, पर कई बार जीवित व्यक्ति भी  लिवर दान करते हैं। कई बार पूरा लिवर बदलने की जरूरत होती है तो कई बार लिवर का केवल कुछ भाग ही बदला जाता है। यह उन व्यक्तियों में किया जाता है, जिनका लिवर फेल हो चुका होता है।

(हमारे विशेषज्ञ - डॉ. जे. सी. विज,
निदेशक और विभागाध्यक्ष,
बीएलके सेंटर  फॉर डाइजेस्टिव एंड लिवर डिजीज और गौरी ऐबट, आयुर्वेद कंसल्टेंट, ग्रीन एज)

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