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धर्म के नाम पर भ्रम

आखिरकार हरियाणा में कथित संत रामपाल की गिरफ्तारी का नाटक खत्म हुआ। इस हिंसक और भयानक नाटक में चार महिलाएं समेत छह को जान गंवानी पड़ी। रामपाल के लोगों ने महिलाओं और बच्चों को ढाल की तरह इस्तेमाल करने की रणनीति अपनाई थी, इसलिए हजारों आम भक्तों को उन्होंने बंधक बनाए रखा था। महिलाओं या बच्चे की मौत क्या गोली लगने से हुई या किसी अन्य वजह से हुई, यह अभी स्पष्ट नहीं हुआ है, लेकिन यह तो स्पष्ट है कि वे रामपाल की जिद व अहंकार के शिकार हुए हैं। रामपाल ने अदालत व सरकार से इस हद तक टकराव का रास्ता क्यों चुना, यह समझ में नहीं आता। पिछले चार साल में चालीस से ज्यादा अदालती समन उन्हें भेजे गए, लेकिन वह अदालत में पेश नहीं हुए। जब हाईकोर्ट ने गैर-जमानती वारंट जारी करते हुए पुलिस से उन्हें पकड़कर लाने को कहा, तो वह राज्य सरकार के साथ खूनी टकराव पर उतारू हो गए। उन्होंने अपने कथित आश्रम को किले जैसा बना रखा था और दो-तीन सौ लोगों की सशस्त्र निजी सेना बना रखी थी, जिसे सेना और पुलिस के रिटायर्ड लोगों ने प्रशिक्षित किया था। क्या उन्हें लग रहा था कि वे सचमुच सरकार और अदालत की सत्ता का मुकाबला कर सकेंगे? यह हो सकता है कि अपने को महान संत की तरह प्रचारित करते हुए वह खुद उस प्रचार पर विश्वास करने लगे हों कि वह संसार का उद्धार करने के लिए अवतरित हुए हैं। उनका अहंकार इस स्तर तक पहुंच गया हो कि उन्हें सरकार और अदालत की ताकत तुच्छ लगने लगी।

इसी अहंकार के चलते उन्होंने हरियाणा में काफी लोकप्रिय आर्य समाज से झगड़ा मोल ले लिया, जो उनके पतन का कारण बना। हरियाणा में परंपरागत धार्मिक परंपराओं के मुकाबले आर्य समाज का प्रभाव ज्यादा है। रामपाल का सबसे बड़ा हिंसक संघर्ष 2006 में आर्य समाज के अनुयायियों के साथ हुआ था, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई थी। उसी हिंसक संघर्ष से जुड़े मुकदमे रामपाल पर चल रहे हैं, वे कुछ वक्त जेल में भी रहे, फिर उन्हें जमानत मिल गई। लेकिन अदालत में पेशियों पर गैर-हाजिरी की वजह से उनकी जमानत रद्द कर दी गई। अगर वह सभी समुदायों से शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व बनाए रखते, तो अनेक ऐसे धर्मगुरुओं की तरह उनका भी कामकाज चलता रहता। रामपाल का जनाधार वैसे भी ऊंची और ताकतवर जातियों के मुकाबले दलित और अति पिछड़ी जातियों में ज्यादा था, लेकिन उन्हें अपनी शक्ति और महानता पर जरूरत से ज्यादा विश्वास हो गया था, जिसका फल पिछले दिनों के हिंसक टकराव में देखने को मिला है।

रामपाल जैसे लोगों की लोकप्रियता कई वजहों से होती है। व्यापक धार्मिक संगठनों के स्वरूप ज्यादा व्यक्ति निरपेक्ष होते हैं, लेकिन ऐसे धर्मगुरुओं से लोगों को व्यक्तिगत संपर्क और सहारे का एहसास होता है। दूसरी बात यह है कि हिंदू धर्म में अब भी निचली जातियों को धार्मिक संगठनों और मंदिरों आदि से दूर ही रखा जाता है, पारंपरिक धर्म में उनकी जगह हाशिये पर होती है, ऐसे में इस तरह के मठ और डेरे उनकी धार्मिक आस्था के आधार बन जाते हैं। इनसे बड़ी तादाद में लोग जुड़े होते हैं, इसलिए राजनीति और प्रशासन से भी ऐसे गुरुओं को संरक्षण मिल जाता है। भारत में ऐसे स्वायत्त धार्मिक समूह ज्यादा हैं, लेकिन अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी ऐसे कई ‘कल्ट’ हुए हैं, जिनसे सुरक्षा बलों को बाकायदा वैसा ही जूझना पड़ा है, जैसे हरियाणा में हुआ। यह मानव समाज और संस्कृति की अजीब गुत्थियों में से है, लेकिन यह कितनी खतरनाक हद तक जा सकता है, इसे रामपाल के उदाहरण से समझा जा सकता है।

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