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खेल मैदान में क्यों पिछड़ते हैं हम

इस सवाल का जवाब आसान नहीं है कि भारत का नाम खेल-संस्कृति वाले बेहतरीन देशों की सूची में क्यों नहीं आता। कई चीजों में, जिनमें किसी देश या किसी क्षेत्र की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक दशा की झलक मिलती है, खेल भी एक है। लोगों की सामूहिक सोच का तरीका किसी राष्ट्र की धारा को तय करता है। मौजूदा माहौल, ऐतिहासिक संदर्भ, भविष्य को लेकर बांधी गई उम्मीदें, ये सब लोगों की इच्छाएं और आकांक्षाएं तय करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। किसी भी राष्ट्र की मानसिकता में ये सारी चीजें बहुत गहराई तक पैठी होती हैं।

मैं पूछना चाहता हूं कि क्यों ज्यादातर मां-बाप चाहते हैं कि उनके बच्चे मेडीसिन या टेक्नोलॉजी पढ़ें? क्यों वे चाहते हैं कि उनके बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर या एक्जीक्यूटिव बनें? अगर उन्हें यह विकल्प दिया जाए कि खेल-स्पर्धा के लिए उनके बच्चों को विदेश यात्रा करना पड़ सकता है या फिर वे कक्षा 12 का बोर्ड इम्तिहान दे सकते हैं, तो ज्यादातर अभिभावक इम्तिहान के पक्ष में ही फैसला सुनाएंगे। मेरी राय में इसका जवाब इस बात में है कि लोग भविष्य के अवसरों के बारे में क्या सोचते हैं। अभिभावकों के लिए बच्चों का सुरक्षित भविष्य सबसे बड़ी चीज है। इसका अर्थ हुआ कि कितनी नौकरियां उपलब्ध हैं या करियर के कितने सारे अवसर उपलब्ध हैं। अगर मां-बाप यह चाहते हैं कि उनका बच्चा मेडीसिन या इंजीनियरिंग पढ़ें, या फिर वह बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन का कोर्स करे, तो इस सोच का कारण होता है इन क्षेत्रों में उपलब्ध अवसर। वे मानते हैं कि इन क्षेत्रों में भविष्य ज्यादा सुरक्षित होगा। भारत में एक पेशे के तौर पर खेल अब भी मुख्यधारा के करियर-विकल्पों में नहीं है। इसका मतलब शायद यह है कि लोग मानते हैं कि खेल का करियर कोई पुख्ता विकल्प नहीं है।

खेल में आगे बढ़ने के लिए सबसे जरूरी चीज है शारीरिक ताकत। यहां पर एक बड़ा मुद्दा उठता है कि भारत में अब भी करोड़ों में लोग इतना नहीं कमा पाते हैं कि हर रोज तीन समय खाना खा सकें। जाहिर है,  ऐसे में खेल प्राथमिकता नहीं होंगे। पूरी दुनिया में हम जो देखते हैं, यह उसके एकदम उलट है, खासकर विकसित देशों में। वहां परिवारों को कम से कम खाने की चिंता नहीं होती है। मेरे हिसाब से यह खेलों में हमारे फिसड्डी रह जाने का सबसे बड़ा कारण है, बावजूद इसके कि हमारे यहां लोग बहुत काबिल हैं। इसी से हम यह भी समझ सकते हैं कि देश में क्यों अचानक ही प्रतिभाशाली खिलाड़ी उभर आता है, जो दुनिया के सबसे बेहतर खिलाड़ी को भी टक्कर दे सकता है।

इसका सबसे बड़ा कारण हमारे यहां हुए विकास का रंग-ढंग है। लेकिन अच्छी बात यह है कि इसमें बदलाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं। हम अब तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था हैं, और कई क्षेत्रों में हम विकसित देशों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मुकाबला कर रहे हैं। अब खेल के क्षेत्र में उन देशों से मुकाबला नीतियों और प्राथमिकताओं का मामला है। अक्सर यह कहा जाता है कि हमारा ज्यादा ध्यान क्रिकेट पर ही रहता है, ज्यादा पैसा यहीं आता है। कहा जाता है कि इसकी वजह से दूसरे क्षेत्र पिछड़ जाते हैं। इस तरह के तर्क से मैं बहुत ज्यादा असहमत नहीं हूं।

इसका मुकाबला करने के लिए हमें कॉरपोरेट जगत से सीखना होगा। भारत के सॉफ्टवेयर उद्योग भारत की कारोबारी क्षमताओं का एक सबसे अच्छा उदाहरण है। यह इस बात का उदाहरण भी है कि संपत्ति और नौकरियों का निर्माण ईमानदारी के साथ कैसे किया जा सकता है। इस उद्योग की पिछले दो दशक की उपलब्धियों ने देश की सबसे बेहतर प्रतिभाओं को आकर्षित किया है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ कि इस उद्योग की सफलता ने दूसरे उद्योगों की संभावनाओं को कहीं नुकसान पहुंचाया हो। उद्योग की तरह का ही मामला खेल का भी है। एक क्षेत्र की उपलब्धियां दूसरे क्षेत्र की कीमत पर नहीं होतीं। अगर क्रिकेट पैसे और लोगों को आकर्षित कर सकता है, तो उसी मॉडल पर दूसरे खेल भी वैसी ही कामयाबी हासिल कर सकते हैं।

सभी खेलों में बस एक चीज जरूरी है कि उनके प्रबंधन को पूरी तरह पेशेवर बनाया जाए। भ्रष्ट और गैर-पेशेवर प्रबंधन भारतीय खेलों की बहुत-सी बुराइयों की जड़ है। राजनीति की तरह ही देश के खेलों में भी वंशवाद चल रहा है। जिन नियमों से यह सब हो रहा है, वे दशकों पहले बने थे, इनको सुधारने की किसी भी कोशिश का विरोध होता है। कंपनी जगत के बहुत सारे उदाहरण हैं, जिनसे खेल जगत सीख सकता है। साइरस मिस्त्री को जिस तरह टाटा समूह का अगुवा बनाया गया, उससे हम सीख सकते हैं कि विरासत किस तरह अगली पीढ़ी को पेशेवर ढंग से सौंपी जा सकती है।

मेरा मानना है कि खेल संगठनों का अगुवा खिलाड़ियों को ही बनाना चाहिए। प्रशासन एक अलग तरह की विशेषज्ञता वाला क्षेत्र है। साफ है, यह समय नए नियम बनाने का है। एक तो यह जरूरी है कि खेल प्रशासन का कार्यकाल पांच साल का किया जाए। इसके साथ ही, जिस तरह कंपनियों के स्वतंत्र निदेशकों के मामले में होता है, उसी तरह की एक कूलिंग ऑफ पीरियड भी जुड़ा होना जरूरी है, इस दौरान वे किसी प्रतिद्वंद्वी कंपनी में काम नहीं कर सकते। इसके अलावा, यह नियम भी बहुत जरूरी है कि एक व्यक्ति अगर पांच साल तक किसी खेल संघ का प्रमुख रह गया, तो उसे अगले पांच साल के लिए इस पद पर रहने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। ऐसा बिलकुल नहीं होना चाहिए कि दशकों तक सारा नियंत्रण एक ही गुट के हाथ रहे। इससे नए लोग नई सोच और नए उत्साह के साथ आएंगे। खेल आखिर उत्साह का ही तो मामला है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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