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धार्मिकता का सेल्फ डिफेंस

मुमकिन है कि आप एक डायबिटिक आदमी को चॉकलेट खिलाएं, तो वह ‘शुगर’ होने की बात कहकर खाने से मना कर दे। मगर उसकी तरफ प्रसाद बढ़ाएं, तो वह खा ले। मिठाई के प्रसाद होने से उसमें पवित्रता आ जाती है व खाने वाले में यह अपराधबोध नहीं रहता कि ‘शुगर’ होने के बावजूद उसने मीठा क्यों खाया। इस मुल्क में धर्म की यही खूबसूरती है। किसी भी तरह के अपराध व अपराधबोध के खिलाफ वह बेस्ट डिफेंस है।

यह देखते हुए कि आज कोई भी धंधा पवित्र नहीं रह गया है, मेरा मानना है कि कुछ करने से पहले आप बाबागिरी में कोई क्रैश कोर्स कर धार्मिकता का सेल्फ डिफेंस तैयार कर लें। आप मोहल्ले के किसी पंडे-पुजारी से सुबह बाबागिरी की ट्रेनिंग लीजिए व शाम को लोकल मार्केट में पायरेटेड सीडी बेचें। सुबह मोटर साइकिल पर गली में मिलावटी दूध बेचें और शाम को ज्योतिष बन इलाके की मां-बहनों के हाथ देखिए।

जिन लोगों ने राजनीतिक संबंधों का फायदा उठाकर जमीनें हथियाईं, वे सत्ता बदलते ही लोकल अर्केस्ट्रा ग्रुप में शामिल हो शादियों में ‘तमा तमा लोगे’ गाने लगते हैं। जिन्होंने बाबागिरी की आड़ में जमीनें हथियाईं, वे भूमाफिया न बन, ख्यातिनाम संत कहलाए। माफिया जमीन से मुनाफा कमा घर चला जाता है, पहुंचा हुआ बाबा उस पर डेरा खोल भक्तों की सेना तैयार कर लेता है। भक्तों की सेना, मतलब धार्मिकता का सेल्फ डिफेंस। यही बात ओसामा बिन लादेन की समझ में नहीं आई और वह मारा गया। अगर उसमें अक्ल होती, तो वक्त रहते ऐबटाबाद की हवेली को डेरे में तब्दील कर देता, उसके छज्जों पर अपने भक्तों को खड़ाकर सैकड़ों सालों तक अमेरिकी सेना से बचा रह सकता था।

सालों पहले सट्टेबाजी के आरोप में फंसे एक भारतीय कप्तान ने यह कह हल्ला मचा दिया था कि मैं अल्पसंख्यक हूं, इसलिए मेरे साथ ऐसा हो रहा है। तब उनके पास धर्म का सेल्फ डिफेंस तैयार था। रामपाल ने जो किया, वह सही है या गलत, उस पर बहस करने की बजाय हम यह सवाल उठा देते हैं कि रामपाल ही क्यों, शाही इमाम क्यों नहीं.. उन्हें भी तो नोटिस मिल चुके है? सुभानअल्लाह! नीरज बधवार

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