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महत्वपूर्ण होने की चाह

हममें से ज्यादातर की अधिकांश आकांक्षाएं पूरी हो सकती हैं, सिवाय महत्वपूर्ण होने की आकांक्षा के। यह अधिकांश लोगों के लिए कठिन है। लेकिन इसके लिए दोषी हम-आप ही हैं। हम सामने वाले को उसके महत्व का आभास कम ही कराते हैं और सामने वाला भी अन्य के लिए ऐसा ही करता है। दरअसल, अपनी जगह पर हर व्यक्ति महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका आभास उसे कर्म से उतना नहीं हो पाता, जितना दूसरों की जुबान से।

आप महत्वपूर्ण हैं। यह सुनना ऐसी भूख है, जो स्थायी है। जो इस भूख को पूरा करने की कोशिश करता है, वह सबका प्यारा बन जाता है। लोग अपनी क्षमता से आगे जाकर भी उसकी मदद करने में संकोच नहीं करते। अब्राहम लिंकन ने यह अद्भुत कला हासिल कर ली थी। वह अपने धुर विरोधी तक की प्रशंसा करने से नहीं चूकते थे। उनके लिए आलोचना शब्द का तो जैसे अस्तित्व था ही नहीं। लिंकन ने अपने बारे में भी कहा है कि वह पढ़ाई में औसत थे और गरीब भी, लेकिन इसी महत्वपूर्ण होने की आकांक्षा के कारण उन्होंने एक रद्दी वाले से 50 सेंट में कानून की किताबें खरीदीं और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। कई ऐसे प्रसंग हैं, जिनसे पता चलता है कि महान लोगों ने महत्वपूर्ण होने की आकांक्षा को जाहिर किया। महान खोजी कोलंबस ने ‘एडमिरल ऑफ द ओशन ऐंड वायसराय ऑफ इंडिया’ के टाइटल के लिए आवेदन दिया था। जॉर्ज वाशिंगटन का आग्रह होता था कि उन्हें ‘हिज हाइनेस, द प्रेसीडेंट ऑफ द युनाइटेड स्टेट्स’ कहकर संबोधित किया जाए। विक्टर ह्यूगो चाहते थे कि पेरिस शहर का नाम उनके नाम पर रखा जाए। बेशक ये सब गलत थे, लेकिन किसी न किसी रूप में ऐसे खयाल हमारे भीतर भी होते हैं। जरूरी नहीं कि ये पूरे हों, लेकिन यह जरूरी है कि हमारे लिए समाज में प्रशंसा का अभाव न हो। और यह तब संभव है, जब हम भी प्रशंसा करना जानें।  प्रवीण कुमार

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  • Web Title:महत्वपूर्ण होने की चाह