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जियो पारसी

भारत के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने पारसियों को आबादी बढ़ने के लिए प्रेरित करने का एक नया रास्ता निकाला है, जिसका नाम है ‘जियो पारसी’ कैंपेन। इस कैंपेन के तहत देश भर में 62,000 के आंकड़ों तक लुढ़क चुके पारसी समुदाय के लोगों को अपनी जनसंख्या बढ़ाने के लिए कहा जा रहा है। लेकिन पारसी समुदाय के भीतर से ही इसका विरोध शुरू हो गया है। मुंबई के सबसे पॉश इलाकों में से एक फोर्ट एरिया में अपने ब्रिटिश काल के ऑफिस में बैठे ‘पारसियाना’ पत्रिका के संपादक जहांगीर पटेल बताते हैं, ‘जब 1000 से 1300 ईस्वी के बीच पारसी भारत आए, तब भी उनकी आबादी आज के मुकाबले ज्यादा थी। लेकिन अपनी कड़ी नीतियों के चलते यह समुदाय सिकुड़ने लगा। अगर कोई महिला पारसी समुदाय से बाहर शादी करती है, तो वह पारसी नहीं रह जाती। अगर कोई बाहरी समुदाय से यहां शादी करके आती है, तो उसे या उसके बच्चों को भी पारसी होने का दर्जा नहीं दिया जाता। ऐसे में, पारसी लोग बढ़ेंगे कैसे?’जहांगीर पटेल कहते हैं, ‘हमने कई बार अपनी मैगजीन के जरिये इन बंधनों को तोड़ने की कोशिश की, लेकिन खास असर नहीं पड़ा। आज भी गैर-पारसी व्यक्ति को पारसियों के मंदिर के अंदर आने की सख्त मनाही है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पीएचडी कर रहीं सिमिन पटेल इस कैंपेन की धुर विरोधी हैं। वह कहती हैं, ‘पारसियों की संख्या बढ़ाने के लिए बच्चे पैदा करने की नहीं, बल्कि पारसी कल्चर को बढ़ाने की जरूरत है।’
 बीबीसी में सुशांत एस मोहन

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