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किताब पर विवाद

पाकिस्तान के अंदर अवाम के खयालों और संवादों को दबाने या उन पर काबू पाने की आदत है, चाहे इसके लिए जायज तरीका अपनाना पड़े या नाजायज। इस दूसरे तरीके में यह खबर जरूर आती है कि कारोबारी सूरमा सदरुद्दीन हशवानी की किताब ट्रूथ ऑलवेज प्रिवेल्स  बाजार से गायब है। चंद रोज पहले ही यह किताब बाजार में आई थी और इस पर जोरों से बहस छिड़ी थी कि किताब में पाकिस्तान के पूर्व सदर आसिफ अली जरदारी के खिलाफ संगीन इल्जाम लगाए गए हैं, जो पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के सह-अध्यक्ष भी हैं और सिंध में पिछले छह बरसों से इस पार्टी की हुकूमत है। काफी मांग के चलते किताब के नए ऑर्डर दुकानदारों ने दिए हैं, मगर गए मंगलवार को लेखक के प्रवक्ता ने बताया कि कराची में किताब की दुकानों से प्रतियां ‘जबरन हटाई’ गईं। जब इस अखबार ने सच जानने की कोशिश की, तो कुछ बड़े दुकानदारों के नुमाइंदों ने कहा कि इस किताब पर एक किस्म की ‘पाबंदी’ लग चुकी है और अब इसकी प्रतियां मौजूद नहीं होंगी। एक प्रवक्ता ने दावा किया कि अलमारियों से किताबें इसलिए निकाली गईं कि इनमें ‘मुल्क की कुछ दमदार शख्सियतों’ के खिलाफ अपमानजनक व गलत बयान थे। वैसे, किताब के खिलाफ कोई ऑफिसियल बैन नहीं है, मगर कराची में दुकानदार बताते हैं कि किन्हीं दबावों के कारण यह किताब स्टॉक में नहीं है। बहरहाल, यह मामला पाकिस्तान में सियासत की पोल खोलता है। इसमें और मलाला की किताब के मामले में थोड़ा ही अंतर है। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) ने मलाला की किताब पर पाबंदी लगाई थी और खैबर पख्तूनख्वा में दुकानदारों को इसे नहीं बेचने की चेतावनी दी गई थी। टीटीपी और पीपीपी की अलग-अलग दुनिया है या यह भी हो सकता है कि लोग ऐसा सोचते हों। जनाब हशवानी ने कई संगीन इल्जाम लगाए हैं और जरदारी ने उन्हें कानूनी नोटिस भेजा है। जरदारी अपनी जगह दुरुस्त हैं, क्योंकि यह उनका हक है कि वह अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। इस तकरार का निपटारा जल्द से जल्द अदालत से होना चाहिए, ताकि बाहर साजिशें बंद हों।   
द डॉन, पाकिस्तान

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