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जिंदगी को मिले मर्ज का मुआवजा 50 हजार...!

जिंदगी को मिले मर्ज का मुआवजा 50 हजार...!

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में यूनियन कार्बाइड से रिसी जहरीली मिथाईल आइसो सायनाइड (मिक) गैस ने लाखों परिवारों के सदस्यों को जीवन भर का मर्ज दे दिया है, मगर राहत के नाम पर सिर्फ 50 हजार रुपये ही उनके हाथ आए हैं। वे जिंदा तो हैं, मगर जिंदगी मौत से भी बदतर है।

भोपाल में दो-तीन दिसंबर, 1984 की रात काल बनकर आई थी, जब यूनियन कार्बाइड संयंत्र से जहरीली गैस रिसी और देखते ही देखते हजारों लोग मौत की नींद सो गए। इतना ही नहीं जहरीली गैस के प्रभाव के चलते आज भी मौत का सिलसिला जारी है, मृतकों के सरकारी और गैर सरकारी आंकड़ों में बड़ा अंतर है। राहत पाने के लिए संघर्ष का दौर अब भी जारी है।

गैस हादसे में मारे गए और बीमारी की जद में आए लोगों की राहत के लिए भारत सरकार और यूनियन कार्बाइड प्राइवेट लिमिटेड (यूएसए) के बीच हुए समझौत पर 47 करोड़ डॉलर मिले, जो भारतीय मुद्रा के अनुसार 1989 में 710 करोड़ रुपये थे। यह राशि भारतीय रिजर्व बैंक में जमा की गई।

यूनियन कार्बाइड से राहत की राशि मिलने के बाद मुआवजा बांटने का सिलसिला शुरू हुआ। गैस की जद में आए 10 लाख 29 हजार लोगों ने राहत पाने का दावा किया, मगर गैस राहत आयुक्त ने पांच लाख 74 हजार 386 को ही गैस पीड़ित मानते हुए मुआवजा तय किया।

गैस राहत आयुक्त ने पीड़ितों के लिहाज से पांच श्रेणियां बनाई। इनमें व्यक्तिगत क्षति, पशु मौत, संपत्ति नुकसान, मृत्यु और व्यावसायिक क्षति शामिल थे। इन पांच श्रेणियों में सबसे ज्यादा पांच लाख 58 हजार 256 को व्यक्तिगत क्षति में रखा गया अर्थात सामान्य बीमार। वहीं मौत का आंकड़ा 15 हजार 342 रहा। मृतकों के परिजनों को जहां 10-10 लाख रुपये दिए गए, वहीं सामान्य बीमारों को दो बार 25-25 हजार रुपये ही मिले।

गैस कल्याण आयुक्त कार्यालय के प्रभारी रजिस्ट्रार फहीम अनवर बताते हैं कि यूनियन कार्बाइड से मिले 710 करोड़ रुपये बैंक में जमा रहते बढ़कर 1586.36 करोड़ रुपये हो गए थे, जिसमें से 1549.30 करोड़ रुपये पीड़ितों को बांटे जा चुके हैं। अब 37.06 करोड़ रुपये शेष बचे हैं।

कांग्रेस नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने वर्ष 2012 में मंत्री समूह बनाया था और गैस पीड़ितों की मांगों पर कार्रवाई का भरोसा दिलाया था, मगर ऐसा हुआ नहीं। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम के नेतृत्व में दल भोपाल भी आया, मगर बात नहीं बनी।

भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के अब्दुल जब्बार का कहना है कि बीमारों के लिए बनाई गई श्रेणी में बड़ी गड़बड़ी हुई है। जो लोग हादसे के 30 वर्ष बाद भी बीमार हैं। उन्हें सामान्य बीमार यानी आंशिक क्षति की श्रेणी में रखा गया, जबकि उन्हें गंभीर बीमार की श्रेणी में रखकर पांच लाख रुपये दिए जाने चाहिए थे। जिन्हें जिंदगी भर के लिए बीमारी मिली है उन्हें दो बार सिर्फ 25-25 हजार रुपये ही मिले हैं। 25 हजार रुपये की दूसरी किश्त भी तब मिली, जब सर्वोच्च न्यायालय ने अक्टूबर 2006 में निर्देश दिया।

भोपाल गैस पीड़ित संघर्ष सहयोग समिति की साधना कार्णिक कहती हैं कि गैस पीड़ितों की कई पीढ़ियों को गैस के दुष्प्रभाव झेलने पड़ेंगे, मगर सरकारों की बदनीयत के चलते कुछ हजार का ही मुआवजा मिला है। सरकारों की नीयत संदिग्ध रही है और उसने पीड़ितों के हक की लड़ाई नहीं लड़ी। भोपाल ग्रुप फॉर इन्फार्मेशन एंड एक्शन की रचना ढींगरा का कहना है कि गैस पीड़ितों को उनका हक नहीं मिला है, इसीलिए उनका संगठन अन्य चार संगठनों के साथ मिलकर संघर्षरत है। उन्होंने कहा कि दिल्ली में निर्जला आंदोलन किया गया, जिसमें केंद्रीय रसायन मंत्री अनंत कुमार ने उनकी मांगें मानने का आश्वासन दिया।

गैस पीड़ित 30 वर्ष बाद भी बीमारियों का दंश झेल रहे हैं और मुआवजे के लिए हर स्तर पर आवाज उठा रहे हैं, मगर उनकी हर मांग को सुनकर भी अनसुना कर दिया जाता है।

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