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तमंचे पे डिस्को वाले जमाने के बाबा

एक मित्र का कहना है कि आजकल बाबा होना बहुत मुश्किल है। पुराने दौर के संतों का जीवन सरल था। वे विनम्रता से कहते थे कि मैं क्या हूं, मैं तो बस वही कह रहा हूं, जो गुरुजनों ने बताया है। पैसा, जमीन कुछ रखते नहीं थे, सो हिसाब-किताब रखने का कोई झंझट नहीं। अगर कोई मारने आता, तो गर्दन सामने कर देते। बात आगे बढ़ी, तो अपने हत्यारे को क्षमा करने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करके शहीद हो जाते।

आज के जमाने में इतने से नहीं चलता। आपके पास कोई यूएसपी होनी चाहिए। कोई ऐसा आयडिया या दावा, जो ओरिजनल हो। आपको यह बताना पड़ना है कि असली माल तो सिर्फ आपके पास है। बाकी जो हैं, वे नकली माल बेच रहे हैं, नक्कालों से सावधान। यानी आपको मौलिक चिंतक और मार्केटिंग विशेषज्ञ, दोनों होना जरूरी है। इसके अलावा, आर्थिक प्रबंधक, राजनीतिक खिलाड़ी, बिल्डर और जैसा कि आसाराम बापू व अब संत रामपाल ने साबित किया कि गुरिल्ला युद्ध विशेषज्ञ और फिर दबंग होना भी जरूरी है। दूसरे लोग सिर्फ विचारक या हवाला कारोबारी या बिल्डर या जमीन पर कब्जे का विशेषज्ञ होने जैसे एक हुनर को सीखने में पूरी जिंदगी लगा देते हैं। इन सारे हुनर का एक साथ माहिर होना कितना कठिन है। अपने बाबा रामदेव तो सबसे निराले हैं। वह योगासनों से सारे रोग दूर कर देते हैं, काले धन के विशेषज्ञ भी हैं, संघर्षशील राजनीतिक कार्यकर्ता भी हैं और जेड श्रेणी की सुरक्षा वाले वीआईपी भी हैं। मानव इतिहास में वह शायद पहले ऐसे बाबा हैं, जिन्हें ‘जेड’ श्रेणी की सुरक्षा मिली है। मुंह पर ब्लैक मनी का मुद्दा व आसपास ब्लैक कैट कमांडो।

पहले संतों का हथियार, पुलिस वगैरह से इतना गहरा रिश्ता नहीं होता था। आज एक बाबा के आसपास ब्लैक कैट कमांडो हैं, तो दूसरे के कमांडो से निपटने में एक राज्य की पुलिस को पसीना आ गया है। वीणा, खडताल, इकतारे का जमाना बीत गया है, अब ‘तमंचे पर डिस्को’ वाले इस जमाने में ‘बंदूक पर अध्यात्म’ होता  है। सचमुच कलयुग एक जटिल युग है। अब बताइए, इस युग में बाबा होना कठिन है कि नहीं?

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