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स्कूली शिक्षा के बाजार तंत्र की सीमाएं

मैं स्वीडन व फिनलैंड 30-35 बार गया हूं, सबको मिलाकर वहां साल से ज्यादा गुजारे। स्वीडनवासी प्रयोगों में अधिक रुचि लेते हैं, जबकि फिनलैंडवासी बुनियादी चीजों पर तवज्जो देते हैं। यह तुलनात्मक, किंतु स्पष्ट अंतर है। इसके आंशिक प्रभाव से ही यहां की स्कूली शिक्षा के इतिहास में कुछ अहम व भिन्न बदलाव हुए। 1990 में स्वीडन स्कूली शिक्षा में ऐसी नीतियां लाया, जो स्कूलों में बाजार-तंत्रों की बड़ी भूमिका पर आधारित थीं। स्वतंत्र व लाभकारी निजी स्कूलों को अनुमति दी गई और सरकारी फंड भी दिए गए। इरादा यह था कि स्कूलों के बीच अधिक मानक परीक्षण के साथ प्रतियोगिता हो। प्रतियोगिता से माता-पिता को विकल्प मिलेंगे, स्कूलों व शिक्षकों की जवाबदेही बढे़गी और इससे तंत्र में अपने आप सुधार होने लगेगा।

दूसरी तरफ, फिनलैंड अपने शैक्षणिक पाठ्यक्रम से जुड़ा रहा, जो 1970 का था। इसमें शिक्षकों के लिए अधिक आजादी थी, विश्वविद्यालय आधारित शोध पर जोर था और सरकारी शिक्षा-तंत्र के जरिये समानता की प्रतिबद्धता थी। स्वीडन के बदलाव फिनलैंड को प्रभावित न कर सके। एक दशक के बाद यह उम्मीद बंधी कि बदलाव ने शैक्षणिक गुणवत्ता में सकारात्मक अंतर लाए हैं। इन्हें दुनिया भर के ‘शिक्षा सुधार उद्योग’ ने अपनाया और बताया जाने लगा कि स्कूली प्रणाली के सुधार में बाजार की केंद्रीय भूमिका है।

जैसे-जैसे साल गुजरते गए, ये शुरुआती उत्साह निराशा और भ्रम की तरफ मुड़ने लगे। प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट असेसमेंट (पीसा) में बीते दस वर्षों से स्वीडन का प्रदर्शन लगातार उतार पर है। अब यह देश आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) देशों के औसत से भी नीचे है।

इसी समय में स्वीडन का उत्तरी पड़ोसी देश फिनलैंड स्कूली प्रदर्शन के मामले में दुनिया भर में नंबर एक पर है। फिनलैंड अपनी बुनियाद पर लगातार काम करता आया और वह सरकारी शिक्षा को लेकर प्रतिबद्ध भी है। बीते कुछ वर्षों से स्कूलों में शिक्षा पाने के लिए छात्र वहां जा रहे हैं। ओईसीडी का अध्ययन बताता है कि स्कूली तंत्रों में शिक्षा के स्तर को सुधारने में बाजार-तंत्र मदद नहीं करता। इसकी बजाय ये असमानता बढ़ते हैं। इसमें हैरत नहीं होनी चाहिए, क्योंकि बाजार तंत्र सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण व अर्ध-सरकारी क्षेत्रों के सही पोषणकर्ता नहीं होते हैं। वैसे भी शिक्षा को आर्थिक विश्लेषण से पूर्णतया नहीं समझा जा सकता। दरअसल, शिक्षा एक मानवीय सामाजिक प्रयास है। यह लोगों को आर्थिक ही नहीं, कई तरह के फायदे देती है। यह किसी समाज को अपने विजन हासिल करने की कोशिश में एक बुनियादी प्रक्रिया भी है। हमारे संविधान के वादे के मुताबिक हमें सभी बच्चों को वाजिब और समान शिक्षा देनी है और यह काम सुव्यवस्थित सरकारी शिक्षा तंत्र के बिना मुमकिन नहीं है।
     (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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