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संवाद का रास्ता

तेज गति के साथ हुए वैज्ञानिक और तकनीकी विकास के बावजूद हमें स्थायी खुशी प्राप्त नहीं हो पा रही। क्यों? इसलिए कि हम सभी इस कदर टेक्नोलॉजी के व्यसनी हो गए हैं कि हमने दिल से दिल मिलाकर लोगों के साथ जुड़ने की सूक्ष्म कला को खो दिया है। आज परिवार के सदस्य ही एक दूसरे से चैट या वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये संवाद करते हैं। आमने-सामने बैठकर बातें करना हो या खाने की मेज पर पारिवारिक चर्चा, इनके लिए किसी के पास भी समय नहीं है। इस वजह से परिवार के सदस्यों के बीच भावनाओं का कोई आदान-प्रदान नहीं होता है और सभी एक यांत्रिक जीवन में सेट हो गए हैं। आज कोई भी व्यक्ति आहत होकर या सामने वाली किसी व्यक्ति से अपमानित होकर दुखी व निराश होना नहीं चाहता, इसलिए बहुत से लोग अकेले रहना ही पसंद करते हैं। ऐसा ही रहा, तो यह दुनिया लोनली प्लैनेट बनकर रह जाएगी।

संवाद को शुरू करके ही हम इसे रोक सकते हैं। इसी के जरिये खुद को और दूसरों को भी समझा जा सकता है और इसी से गलतफहमियों को भी दूर किया जा सकता है। परस्पर सम्मान से इसे हम मजबूत बना सकते हैं। हम जिसके साथ संवाद कर रहे हैं, अगर हम उनका सम्मान नहीं करते हैं, तो यह सामने वाले को तुरंत समझ में आ जाता है, क्योंकि शब्द परस्पर संवाद का एक छोटा-सा हिस्सा भर होते हैं। हमारी सच्ची भावनाएं निश्चित रूप से हमारी आंतरिक अवस्था को सबके सामने प्रकट कर देती हैं, चाहे हमें पसंद हो या नहीं हो। इसके लिए जरूरी है खुद को जानना और समझना। यही सबसे पहली शर्त है, क्योंकि जितना अधिक हम स्वयं को जानेंगे, उतना ही ज्यादा हम दूसरों को समझने में सक्षम और समर्थ हो पाएंगे। तो चलिए, स्वयं को जानने की एक नई यात्रा करते हैं। इस यात्रा में सबके साथ संवाद भी है और जीवन का आनंद भी।
                                       

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