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कुछ सार्थक गढ़ने की पीड़ा

अक्सर सौ में से निन्यानबे बार आपके अपने बच्चे ही आपको आईना दिखा देते हैं। मेरे बेटे आदित ने बड़ी मासूमियत से कह दिया बीती रात, ‘जब देखो तब, आप कोई न कोई किताब लेकर ट्रान्सलेट करते रहते हो। मम्मा, आप अपना कुछ क्यों नहीं लिखते?’ मैं उसकी बात पर हंस पड़ी थी, और भाई को फोन किया था कि देखो, मेरे पेट का जाया मेरा ही टास्क मास्टर हो गया है। लेकिन फिर उसकी बात पर देर तक सोचती रही। बच्चे हमारी कमजोरियों, हमारे डर और हमारी फितरत को हमसे बेहतर जानते हैं। आदित जानता है कि मैं इन दिनों किस चीज से भाग रही हूं। मैं इन दिनों लिखने से भाग रही हूं।.. कैसे कहूं आदित को कि जुनून तो है, हिम्मत नहीं। हर कहानी के साथ लगता है कि आंख पर पड़ परदा हट गया। कोई झिल्ली थी, जो फट गई है। किरदारों के दर्द इस तरह काटते हैं कि अपने पैर की बिवाई हों। दुनिया बेमानी और बेमुरव्वत लगती है। हर इंसान बेचैन, हर रूह बेकल।.. हम सबके कांधों पर सिर्फ खो देने का डर है- अपनी ताकत, अपनी शोहरत, अपना परिवार, अपने ख्वाब, अपना प्यार, अपनी चाहत, अपनी जान खो देने का डर। हम हैं क्या सिवाय डर के पुलिंदों के?.. इसलिए कहानियां लिखने वाले दौर का अभी इंतजार है। तब तक किसी और के लिखे का तर्जुमा ही कर लेने दो। चांद निगलने की ताकत फिलहाल मुझमें नहीं, इसलिए ‘आई स्वालोड द मून’ का अनुवाद करने दो। अभी हिम्मत जुटा रही हूं। डर और डर से क्षणभंगुर आजादी की कहानियां लिखने में अभी थोड़ा और वक्त है।
  मैं घुमन्तू में अनु सिंह चौधरी

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