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चालीस साल बाद महिलाएं भी रात में देख रही गीत-नृत्य

लगभग चालीस साल के बाद सोनपुर मेले में यह स्थिति आयी है कि महिलाएं भी रात में बेखौफ होकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनंद उठा रही हैं। वर्ष 1975 तक मेले में मनोरंजन का स्वस्थ माहौल था और तब महिलाएं भी अपनी सहेलियों के साथ सांस्कृतिक कार्यकमों का आनंद उठाया करती थीं।

बाद में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के नाम पर ऐसी अश्लीलता छायी और एक ऐसा जमाना कायम हुआ कि सांस्कृतिक पंडालों और मेले के अन्य खेल-तमाशों में केवल दिन में ही महिलाएं दिखाई पड़ती थीं और रात पुरुषों के कब्जे में होती थी। इस बार थियेटरों की ओर लोगों के बढ़ते पांव रोकने में पर्यटन विभाग और जिला प्रशासन कामयाब हुआ और ऐसा देश के नामी -गिरामी कलाकारों की जादुई प्रस्तुतियों के कारण संभव हो सका।

पांच नवंबर को सरोजा वैद्यनाथन की नृत्य नाटिका के बाद गत 9 नवंबर की शाम में मुंबई के गायक तलत अजीज की गायकी और नीलम चौधरीकी नृत्य नाटिका की प्रस्तुति के दौरान दस हजार से अधिक दर्शकों में हजार से अधिक महिलाएं थीं। पंडाल के भीतर व सामने सड़क पर पांव रखने की जगह भी शेष नहीं थी। 15 नवंबर की रात में श्यामा झा के लोक संगीत और स्मिता बेल्लुर के सूफी गायन में महिला दर्शकों की अच्छी संख्या स्वस्थ मनोरंजन की ओर बढम्ते मेले का गवाह बन रही थी।

यहां तक कि 17 नवंबर को शिवचरण प्रसाद के गायन, पश्चिम चंपारण के सांस्कृतिक दल के आदिवासी नृत्य और मुंबई की गायिका कल्पना को सुनने के लिए भी सैकड़ों महिलाएं आयीं। अबतक तीस से अधिक सांस्कृतिक संस्थाएं कार्यक्रम प्रस्तुत कर चुकी हैं। चार दिसंबर तक कार्यक्रम होना है। 20 को कवि सम्मेलन सह मुशायरा और 22 को मुंबई की गायिका अनुराधा पोड़वाल का कार्यक्रम होना है। खास बात यह कि सांस्कृतिक मंच पर लोक गीत-नृत्य का ही ज्यादा जलवा है।

भीड़ ऐसी कि याद आया भिखारी ठाकुर का जमाना
मेले के मुख्य सांस्कृतिक पंडाल के दर्शक दीर्घा में महिलाओं की हो रही उपस्थिति भविष्य की बेहतरी की ओर भी संकेत कर रही है। 1962 से 1965 के दौरान मेले में भोजपुरी के शेक्सपीयर कहे जानेवाले भिखारी ठाकुर के भी सांस्कृतिक शिविर लगा करते थे। बड़े-बुजुर्ग बताते हैं, भिखारी का बिदेसिया देखने के लिए महिलाओं की लंबी कतार लग जाती थी। बिदेसिया को गीत-नृत्य की एक विशिष्ट शैली के रूप में जाना जाता है।

शादी के बाद आर्थिक संकट के कारण घर पर नई-नवेली बहू को छोड़कर नायक बाहर कमाने चला जाता है। वहां वह प्यारी सुंदरी के रूपजाल में  फंसकर अपनी पत्नी को भूल जाता है। लेकिन बटोही जब उसे उसकी पत्नी की व्यथा सुनाता है तो पत्नी की याद बज उठती है- हमरो धनि बारी अंगवा के पतरी से चोखे-चोखे नैना रतनार रे बटोहिया। उस जमाने के कई बुजुर्ग बताते हैं, मेले में भिखारी के शिविर में तब इतनी भीड़ उमड़ती थी कि संभालने के लिए प्रशासन को विशेष प्रबंध करना पड़ता था।

एक ओर भिखारी के शिविर तो दूसरी ओर गुलाब बाई की नौटंकी से उठती तानें दर्शकों पर सम्मोहक प्रभाव डाला करती थीं। दोनों के कार्यक्रमों में एक समानता यह थी कि उनके पात्रों के सारे संवाद पद्य में हुआ करते थे। नौटंकी पर पारसी थियेटर का प्रभाव था जिसमें खेले जानेवाले सारे नाटकों के संवाद पद्य में होते थे।

रामायण मंचन ने बिखेरी संस्कृति की खुशबू
पर्यटन विभाग के सौजन्य से हरिहरनाथ मंदिर न्यास समिति के तत्वावधान में 2012 में शुरू किया गया रामायण मंचन ने मेले में आध्यात्मिक संस्कृति का ऐसा माहौल बनाया जिसकी खुशबू पूरे राज्य में फैल रही है। अब यह मेला रामायण मंचन के लिए भी जाना जाने लगा है। मंदिर से सटे दक्षिणी भाग में रोजाना पच्चीस हजार से अधिक दर्शकों ने यह कार्यक्रम देखा।
उनमें दो तिहाई संख्या महिलाओं की रही।

इस कार्यक्रम के कांसेप्ट का श्रेय धार्मिक न्यास बोर्ड के अध्यक्ष किशोर कुणाल और मंदिर न्यास समिति के अध्यक्ष एवं एडीजी मुख्यालय गुप्तेश्वर पांडेय को है। 2013 से पर्यटन विभाग इस कार्यक्रम के लिए वित्तीय सहयोग कर रहा है। इस बार 11 से 18 नवंबर तक यह मंचन चला और 19  से 21 नवंबर तक छत्तीसगढ़ के कलाकार कृष्ण लीला की प्रस्तुति करेंगे।

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