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झारखंड में जीत के लिए भाजपा ने खेले सारे दांव

झारखंड में जीत के लिए भाजपा ने खेले सारे दांव

लोकसभा चुनावों में राज्य में भारी जीत दर्ज करने के बावजूद भाजपा झारखंड में विधानसभा चुनावों को लेकर काफी सतर्क है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने राज्य में कुछ कड़े व बड़े निर्णय लिए है। कुछ मामलों में असंतुष्ट धड़े ने दिल्ली में कुछ बड़े नेताओं से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नेतृत्व तक गुहार भी लगाई है, लेकिन इसे भी ज्यादा महत्व नहीं मिला है।

झारखंड में आम तौर पर संघ की राय को भाजपा में काफी महत्व दिया जाता है। इसकी एक बड़ी वजह आदिवासी क्षेत्रों में संघ के विभिन्न संगठनों की पकड़ है। उनके साथ न केवल स्थानीय लोग जुड़े है, बल्कि पार्टी का असली काडर में भी उस का बड़ा हिस्सा है। हरियाणा व महाराष्ट्र में मिली जीत के बाद भाजपा नेतृत्व ने झारखंड में सिर्फ जीत को देखते हुए टिकट बांटे, जिसमें बाहर से आए कई ऐसे लोग भी टिकट पा गए हैं, जिनके मुकाबले में संघ समर्थित कई दावेदार भी थे।

सूत्रों के अनुसार संघ के राज्य नेतृत्व के विपरीत केंद्रीय नेतृत्व इस समय भाजपा की सरकार बनने को अन्य मुद्दों के मुकाबले सबसे उपर मान रहा है। यही वजह है कि संघ भी इस समय पार्टी को सुझाव से ज्यादा कोई निर्देश नहीं दे रहा है। उसने अपनी राय के विपरीत फैसलों पर चुप्पी साध ली है।

मुख्यमंत्री पद के मामले में भी संघ की राज्य शाखा का एक बड़ा वर्ग आदिवासी मुख्यमंत्री के पक्ष में है, लेकिन जातिवादी व सामाजिक समीकरणों को तोड़कर हरियाणा व महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री बनाने वाले भाजपा झारखंड में भी गैर आदिवासी मुख्यमंत्री पर दांव लगाने के पक्ष में है।

पार्टी रणनीतिकारों का मानना है कि आदिवासी वोट झामुमो व बाबूलाल मरांडी में भी बंटेगा। ऐसे में राज्य में गैर आदिवासी वर्ग निर्णयक भूमिका में रहेगा।

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