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लेकिन जर्मनी में संस्कृत का क्या होगा

इस बात के लिए जर्मन नेताओं की तारीफ होनी चाहिए कि उन्हें अपनी भाषा की चिंता है। ब्रिस्बेन में हुई जी-20 की बैठक में जर्मन चांसलर अंगेला मर्केल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अलग से मिलीं और केंद्रीय विद्यालय संगठन (केवीएस) में जर्मन भाषा की जगह संस्कृत पढ़ाए जाने को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की। उन्हें खलिश है कि केंद्रीय विद्यालय संगठन के 1,092 स्कूलों के करीब 80 हजार छात्र डॉयच लैंड (जर्मनी का वास्तविक नाम) की भाषा पढ़ने से वंचित हो जाएंगे। चांसलर मर्केल की इस चिंता का असर यह हुआ कि अपना मानव संसाधन मंत्रालय इस पर विचार करने में लगा है कि कम से कम इस सत्र में पुरानी व्यवस्था,  यानी जर्मन को तीसरी वैकल्पिक भाषा के रूप में पढ़ाने की अनुमति दी जाए। 2011 में मानव संसाधन मंत्रालय ने नई दिल्ली स्थित गोएथे इंस्टीट्यूट से समझौता किया था और केंद्रीय विद्यालयों में त्रिभाषा सूत्र के तहत जर्मन को एक वैकल्पिक भाषा के रूप में शामिल कर लिया गया।

केंद्रीय विद्यालयों में जर्मन भाषा कार्यक्रम पर जर्मनी सरकार का सालाना कोई दस लाख यूरो खर्च होता है। गोएथे इंस्टीट्यूट से हुए इस समझौते का नवीकरण सितंबर 2014 में होना था। मगर मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी का मंतव्य था कि इस समझौते का कोई कानूनी आधार नहीं है,  यह ‘अवैधानिक और असांविधानिक’ है,  इसलिए इसे स्वीकृत करने की आवश्यकता नहीं है। मानव संसाधन मंत्री के मंतव्य के ठीक उलट ब्रिस्बेन में भारतीय विदेश मंत्रलय के प्रवक्ता सैयद अकबरुद्दीन के बयान को जर्मन रेडियो-टीवी डॉयच वेले ने उद्धृत किया कि ऐसा कुछ अभी तय नहीं हुआ है,  प्रधानमंत्री मोदी ने चांसलर मर्केल से बातचीत में आश्वासन दिया है कि हमारी सरकार का प्रयास यह है कि छात्र अधिक से अधिक विदेशी भाषा सीखें। क्या यह विरोधाभास नहीं है कि सरकार के एक मंत्री के फैसले पर दूसरे मंत्रालय का प्रवक्ता यह स्पष्टीकरण देता है कि ‘इस पर अभी निर्णय नहीं हुआ है?’  या तो मंत्रालयों में तालमेल नहीं है या फिर सरकार झुक गई।

दिल्ली में जर्मन राजदूत मिशाइल स्टैइनर इस बात के लिए सरकार पर लगातार दबाव बनाए हुए थे कि समझौते का नवीकरण हो जाए। यह इस बात का सुबूत है कि जर्मन नेता,  और उसके कूटनीतिक अपनी राष्ट्रीयता और भाषा से कितना सरोकार रखते हैं,  और उसके प्रति कितने संवेदनशील हैं। ये लोग सचमुच प्रशंसा के लायक हैं। हमारे राष्ट्रवाद में और जर्मन राष्ट्रवाद में कितना फर्क है, उसका सबसे बड़ा उदाहरण संस्कृत है। साल 2001 में मुझे जर्मनी के कोलोन शहर स्थित रेडियो डॉयचे वेले में संपादक का दायित्व संभालने का अवसर मिला था। तब डॉयचे वेले  में 31 भाषाओं में खबरें प्रसारित होती थीं। संस्कृत भाष भी उनमें से एक थी,  और वहां हम सभी भारतीय इस पर गर्व करते थे। 2003 के जून में खबर मिली कि मैनेजमेंट ने संस्कृत भाषा के प्रसारण को बंद करने का फैसला कर लिया है। तब भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी हुआ करते थे। उन्हें जर्मनी में उस समय रह रहे तमाम प्रवासी भारतीयों की ओर से पत्र भेजा गया। बॉन से लेकर बर्लिन तक रह रहे भारतीय कूटनीतिकों से गुहार लगाई गई कि इस बारे में जर्मन सरकार से बात की जाए। लेकिन न तो प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यालय से कोई पत्र जर्मनी रवाना हुआ,  और न ही किसी भारतीय दूत ने इसकी सुध ली।

रेडियोडॉयचे वेले से संस्कृत भाषा में प्रसारण बंद होना था,  सो हो गया। जर्मनी में सबसे पहले जेना यूनिवर्सिटी में 1817 में संस्कृत और दूसरी भारतीय भाषाओं का शिक्षण प्रारंभ हुआ था। 1818 में बॉन यूनिवर्सिटी में ऑगस्त विलहेम श्लेगेल की अध्यक्षता में बाकायदा संस्कृत ‘चेयर’ की स्थापना की गई। बाद में फ्रांज फोरलांडर ने बर्लिन की हुमबोल्ट यूनिवर्सिटी में संस्कृत पीठ की स्थापना की। इसके प्रकारांतर बावेरिया,  बाडेन वुटेनबर्ग,  वुर्जबर्ग,  म्यूनिख, हाइडेलबर्ग,  लाइपजिग,  लुडविग मैक्सिमिलन विश्वविद्यालयों में संस्कृत और भारतीय भाषाओं के ‘चेयर’ की स्थापना होती चली गई। यह दिलचस्प है कि जर्मन विश्वविद्यालयों में भारतीय भाषा केंद्र और संस्कृत की उन्नति में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार और तब के जर्मन प्रशासन ने सर्वाधिक दिलचस्पी दिखाई थी। बॉन यूनिवर्सिटी में हिंदी विभाग के प्रोफेसर वार्नर वेसलर ने मुझे एक बार जानकारी दी थी कि अंग्रेजी भाषाविद् विलियम जोन्स ने कालीदास के अभिज्ञान शाकुंतलम का अनुवाद किया था, जिसकी जर्मन कॉपी वहां उपलब्ध है। बाद में जर्मन विद्वान गोएथे ने शाकोन्तला नाम से अभिज्ञान शाकुंतलम का अनुवाद करके अपनी कृति को अमर कर दिया। मुझे नहीं लगता कि किसी भारतीय नेता ने फ्रैंकफर्ट में गोएथे के जन्मस्थल पर जाकर उनकी संस्कृत सेवा के लिए दो फूल भी डाले होंगे।

फैंकफर्ट एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय मार्ग है,  जिससे होकर अधिकांश भारतीय नेता अमेरिका जाते रहे हैं। पता नहीं हम संस्कृत की सेवा करने वाले विदेशी विद्वानों के प्रति कृतज्ञ हैं, या कृतघ्न। हिटलर जैसे तानाशाह ने संस्कृत को समझने,  और उसे उर्वर करने में योगदान किया था। जर्मन जाति को आर्यन रेस से जोड़ने,  यूरोपीय भाषाओं की जड़ संस्कृत में खोजने,  या फिर स्वास्तिक को नाजी पार्टी का प्रतीक चिह्न बनाने जैसे प्रश्नों की पड़ताल करते समय जर्मनी में संस्कृत की जड़ें विस्तृत होती दिखेंगी। वायमार में गोएथे ने संस्कृत को समृद्ध करने के लिए काफी कुछ किया था। उसके बहुत बाद हिटलर ने वायमार को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया। तब हिटलर चाहता,  तो संस्कृत भाषा की तमाम पांडुलिपियों और पुस्तकों को तहस-नहस कर सकता था। मैक्समूलर  का योगदान तो और भी जबरदस्त था। फ्रिडरिश शीलिंग से बर्लिन में दीक्षित मैक्समूलर ने लाइपजिग यूनिवर्सिटी में संस्कृत की जड़ों को मजबूत करने के लिए काफी कुछ किया। मैक्समूलर इगुने बार्नआउफ से संस्कृत को और गहराई से समझने के लिए 1845 में पेरिस चले गए। मैक्समूलर ने ऋग्वेद का अनुवाद किया था,  और उस कार्य में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने उनकी बड़ी मदद की थी।

मैक्समूलर रामकृष्ण परमहंस के बहुत बड़े प्रशंसक थे। उनकी कृतियों में वेदांतिक दर्शन की छाप वहीं से आई। ब्रह्म समाज में मैक्समूलर की इतनी आस्था बढ़ी कि उन्हें जर्मनी में ईसाई विरोधी तक करार दिया गया। उसी जर्मनी में संस्कृत की उपेक्षा समकालीन राजनेताओं ने की है। उसके लिए हमारी राजनीति भी दोषी है। कपिल सिब्बल चाहे मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी को संस्कृत के सवाल पर जितना कोस लें,  आरोप लगा लें,  लेकिन शायद ही उन्होंने अपने कार्यकाल में जर्मनी की सरकार से पूछा होगा कि भारतीय भाषाओं,  खासकर संस्कृत अब वहां क्यों उपेक्षित है?  क्या मोदी सरकार केंद्रीय विद्यालयों में जर्मन को शिक्षण कार्यक्रम में डालने से पहले रेडियो डॉयचे वेले  में संस्कृत प्रसारण की शर्त रखने की स्थिति में है?
 (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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