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खुल रहे हैं एफडीआई के नए रास्ते

दुनिया भर में हुए अध्ययन यही अनुमान लगा रहे हैं कि भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) बढ़ने वाला है। ऑस्ट्रेलिया में जी-20 शिखर सम्मेलन तथा म्यांमार में आयोजित 12वें भारत-आसियान सम्मेलन में जो माहौल दिखा, उससे एफडीआई की नई संभावनाएं दिख रही हैं। यह अच्छी खबर इसलिए है,  क्योंकि इस समय देश को बुनियादी ढांचा निर्माण और उच्च विकास दर प्राप्त करने के लिए विदेशी निवेश की भारी दरकार है। पर पिछले कुछ वर्षों से विदेशी निवेशक भारत से दूरी बनाए हुए हैं। देश में एफडीआई का प्रवाह 2013-14 में 24.3 अरब डॉलर रहा। 2008-09 की वैश्विक मंदी के दौरान भी भारत में 40.4 अरब डॉलर का निवेश आया था। विश्व बैंक की नई रिपोर्ट के अनुसार, 2013-14 में जहां चीन को वैश्विक एफडीआई प्रवाह का करीब आठ फीसदी प्राप्त हुआ है,  वहीं भारत के पास इस प्रवाह का सिर्फ 0.8 प्रतिशत ही आ पाया।

विदेशी निवेश को आकर्षित करने वाले कई महत्वपूर्ण आधार भारत के पास हैं। विशाल शहरी व ग्रामीण बाजार, दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ मध्यम वर्ग,  अंग्रेजी बोलने वाली नई पीढ़ी और विदेशी निवेश पर अधिक रिटर्न जैसे कई सकारात्मक पहलू मौजूद हैं। अंतरराष्ट्रीय तुलनात्मक कार्यक्रम (आईसीपी) रिपोर्ट 2014 में कहा गया है कि क्रय शक्ति क्षमता यानी परचेजिंग पावर पैरिटी (पीपीपी) के आधार पर अमेरिका और चीन के बाद भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। हमारे पास आईटी, सॉफ्टवेयर, बीपीओ,  फार्मास्युटिकल्स,  ऑटो-मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स,  केमिकल्स और धातु क्षेत्र में दुनिया की जानी-मानी कंपनियां हैं,  आर्थिक व वित्तीय क्षेत्र की शानदार संस्थाएं हैं। भारत दवा निर्माण,  रसायन निर्माण और बायो-टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में सबसे तेजी से उभरता हुआ देश है। लेकिन कई वजहों से एफडीआई ने भारत से मुंह मोड़ लिया। केंद्र में नई सरकार के आने के बाद अब नई उम्मीद जगी है।

कुछ बदलाव तो दिखने भी लगे हैं। छोटी कंपनियों के लिए पूंजी जुटा रहे भारतीय हेज फंड मई 2014 से जून 2014 तक के पिछले छह माह में 46 फीसदी बढ़ोतरी का रिटर्न दे चुके हैं, जो चीन के मुकाबले करीब 15 गुना है। नई संभावनाओं में एक और पहलू चीन के आर्थिक मॉडल में आ रहा बदलाव है। दुनिया का कारखाना कहा जाने वाला चीन अब सेवा क्षेत्र की ओर रुख करना चाहता है,  जहां बहुत अधिक विदेशी निवेश की जरूरत नहीं होती। फिर चीन की कामकाजी युवा आबादी तेजी से कम हो रही है। ऐसे में,  अगले एक दशक में चीन में विदेशी पूंजी निवेश की दर में कमी आने की आशंका है। इसकी वजह से आने वाले 5-10 साल में दुनिया भर में बड़ी मात्रा में सस्ती विदेशी पूंजी उपलब्ध होगी। अब भारत को ऐसी नीतियां बनानी होंगी कि दस्तक दे रही एफडीआई लौटे नहीं।
 (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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