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एटीएम से डीलिंग और आपकी औकात

एटीएम इंसान की औकात पहचानता है। उस दिन मैंने पांच सौ रुपये एटीएम से निकाले,  तो सौ-सौ के पांच नोट निकले। यह नहीं कि एटीएम पांच सौ का नोट निकाल देता। एटीएम सोचता है कि पांच सौ रुपये के लिए यहां आया है यह बंदा,  एक झटके में पांच सौ खर्च करने की औकात और जरूरत नहीं होगी इसकी,  सौ-सौ के नोट ही देना बेहतर है। वरना पांच सौ के छुट्टे कराने में और परेशान होगा। एटीएम से डील करने में इज्जत बची रहती है,  इंसानों के आगे तो कई बार खराब हो जाती है। एक बैंक में अकाउंट था मेरा,  पांच सौ रुपये निकालने होते थे मुझे। मतलब इतने ही पड़े होते थे अकाउंट में। बैंक के कैशियर मुझे एक अखबार में छपे मेरे फोटू की वजह से जानते थे और इस गलतफहमी में गिरफ्तार थे कि अखबार में जिसकी फोटू छपती है,  वह बड़ा आदमी होता है। बाद में उन्हें समझाया कि वांटेड-अपराधी,  नेता और लेखक,  तीनों की तस्वीरें नियमित तौर पर अखबारों में छपती हैं, पर बड़े आदमी सिर्फ वांटेड-अपराधी और नेता ही होते हैं।

वह कैशियर सज्जन मुझसे वर्ल्ड बैंक,  अर्थव्यवस्था की हालत पर गंभीर बहस छेड़ देते और फिर पूछते,  कैसे आना हुआ? अब अरबों की डिबेट के बाद मैं शर्म से कह नहीं पाता था कि पांच सौ रुपये निकालने हैं। बिना पैसे वापस आ जाता था। अब एटीएम के सामने तनकर पांच सौ रुपये निकालता हूं। एटीएम के सामने बंदा बेशर्मी की हद तक बेतकल्लुफ हो सकता है। एक बार मैंने हजार रुपये का चेक अपने बैंक में लगाया था क्लियर होने के लिए। उस बैंक में एक दिन में तीन बार जाकर कनफर्म किया कि वह रकम मेरे खाते में आई कि नहीं। इन्क्वॉयरी वाले क्लर्क के चेहरे पर वह भाव होता था,  जो किसी अमेरिकी राष्ट्रपति के चेहरे पर पाकिस्तानी पीएम को खैरात देते वक्त होता है। अब एटीएम पर पांच बार कनफर्म कर लो कि चेक आया कि नहीं,  बेइज्जती नहीं होती। जब भी कोई यह कहता है कि एटीएम बैंक की लाइन में वेस्ट होने वाला टाइम बचाता है,  तो मन होता है कि कह दूं,  यह उनकी इज्जत भी बचा लेता है,  जिनकी इज्जत यूं है नहीं।

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