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उनकी लकीर पर

वह लकीर के फकीर हैं। अपने आदर्श की हर बात पर चलने वाले। कहते हैं कि आखिर मैं उनका अनुयायी हूं,  फिर उनकी बात क्यों न मानूं?  आप जिसके अनुयायी हैं,  उनकी बातों पर हर हाल में अमल करना चाहते हैं। नहीं कर पाते,  तो खुद को कोसते हैं। मोटिवेशनल एक्सपर्ट रॉबर्ट ग्रीन कहते हैं- ‘अनुयायी बनना अच्छी बात है,  लेकिन यह आपकी अंतर्शक्ति को जागृत नहीं कर सकता। अनुसरण करना आपको अच्छे पथ पर ले जा सकता है,  लेकिन कभी भी पथ-प्रदर्शक नहीं बना सकता।’  ग्रीन की बातों में दम है। आपको गुणों का सम्मिश्रण खुद में जमा करना चाहिए,  न कि इस जैसे या उस जैसे बनना। यह ठीक वैसे है,  जैसे आप किसी से ईंट ले सकते हैं,  किसी से गारा और फिर अपना घर बना सकते हैं। अगर आप किसी दूसरे के घर को ही अपना कहते या समझते हैं,  तो यह बेवकूफी ही कही जाएगी।

कहते हैं कि दुनिया का जितना नुकसान अनुसरण ने किया है,  उतना किसी ने नहीं। बुद्ध कहते रहे कि अपने दीपक आप बनो,  लेकिन दुनिया उनके जलाए दीपक के प्रकाश से ही नहाने में अपने को धन्य समझती रही। अनुसरण करना बुरा नहीं,  लेकिन इतना अधिक करना भी ठीक नहीं। प्रवृति रचनात्मक ही होनी चाहिए। नए-नए काम करने, काम को नए-नए तरीके से करना,  अपने काम को दुहराने से बचना ही वह स्वभाव है,  जो एक रचयिता का होता है। पाब्लो पिकासो का कहना था- ‘ईश्वर सबसे अजीब कलाकार है,  उसने जिराफ बनाया,  हाथी और बिल्ली भी। उसकी कोई खास शैली नहीं है। वह हमेशा कुछ अलग करने का प्रयास करता रहता है।’ पहले से तय ऐसी राह,  जो सफल बना सकती है,  ललचा सकती है,  क्योंकि यह आसान है और हमारे भीतर पैठी भीरुता को भी भाती है। लेकिन हमें अतीत के प्रति निर्मम होना चाहिए और काम में ऐसे जुटना चाहिए,  जैसे कोई पहली बार जुटा हो। नयापन खुद-ब-खुद दिखने लगेगा।

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