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नेहरू पर लिखने से पहले

पहली बार इस साल नवंबर की आहट के साथ मेरे मन में एक भोली इच्छा ने जन्म लिया कि इस बार बच्चों के चाचा कहे जाने वाले जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन पर कुछ लिखूंगा। दिक्कत यह हुई कि नेहरू के बारे में जितनी भी अच्छी बातें हो सकती हैं,  वे सब हमें स्कूल की किताबों और निबंध-भाषण प्रतियोगिताओं के जरिये बताई जा चुकी हैं। और अब जब मेरे सिर के बाल नेहरू स्टाइल में होने को आए हैं,  तब मन बार-बार पूछता है कि देश के पहले कर्णधार ने देश को कौन-सी दिशा दी? जहन में सवाल उठता है कि बाबर ज्यादा काबिल था या नेहरू? हुमायूं की तुलना इंदिरा से संभव है, क्या राजीव गांधी अकबर बन सकते थे?..क्या राहुल गांधी भरी जवानी में बहादुर शाह जफर बन जाएंगे? मन में सवाल उठा कि क्या जवाहरलाल ने भारत की नियति से भेंट अंग्रेजी में न कराकर हिन्दुस्तानी में कराई होती, तो इस देश का मुस्तकबिल कुछ और होता?

जब मेरे बाल दिवस थे,  तब तो लड्डू से मन बहल जाता था,  लेकिन अब मन सोचता है कि एशिया के जो मुल्क हमारे साथ या हमारे बाद आजाद हुए, उनकी तुलना में भारत कहां है? जिन देशों के पास नेहरू न थे,  उनका भविष्य कैसा रहा?  नेहरू न होते,  पटेल होते जैसी बातों में मुझे यकीन नहीं। यूं होता तो क्या होता..का कोई अंत नहीं। लेकिन जो हुआ़,  वह कैसे हुआ,  उसी को समझने की कोशिश है..और हुआ यही कि नेहरू हुए,  करोड़ों भारत के मुस्तकिबल हुए।
बना रहे बनारस में रंगनाथ सिंह

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