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आस्था के नाम पर

हरियाणा में संत रामपाल और भारतीय गणतंत्र की संस्थाओं के बीच जैसा खुला टकराव देखने में आ रहा है,  वह अप्रत्याशित या अनोखा नहीं है। पिछले साल आरासाम बापू की गिरफ्तारी के वक्त भी ऐसा ही हुआ था और ऐसे कई स्वघोषित संत होंगे,  जिन पर आपराधिक आरोप हैं और जिनकी किलेबंदी भी रामपाल और आसाराम जैसी ही होगी। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने संत रामपाल की गिरफ्तारी के आदेश दिए हैं,  क्योंकि वह लंबे वक्त से उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की सुनवाई में पेश नहीं हो रहे थे। संत रामपाल अपने को धार्मिक और आध्यात्मिक गुरु कहते हैं,  लेकिन उनका या उनके अनुयायियों का आचरण कहीं से भी धर्म या आध्यात्मिकता के अनुकूल नहीं है। यह स्थिति कई वजहों से बनी है। पहली वजह तो यह है कि भारत में कानून के पालन को लेकर कोई सख्ती नहीं है और लोग यह मानते हैं कि कानून को ताकत या रसूख के सहारे झुकाया जा सकता है।

हरियाणा में ही अनेक उदाहरण हैं कि दबंग लोगों या समूहों ने खुलेआम कानून को तोड़ा और प्रशासन ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। ऐसे में यह धारणा बन गई है कि कानून सिर्फ कमजोर और साधनहीन के लिए है। इसीलिए जब तक हाईकोर्ट ने फटकार नहीं लगाई,  तब तक राज्य सरकार ने इस मामले में कार्रवाई नहीं की। हमारे वक्त में आध्यात्मिकता या धर्म के पैमाने भी बदल गए हैं। धर्म की सत्ता,  नैतिक सत्ता होनी चाहिए,  लेकिन आजकल तमाम धार्मिक नेता इस नैतिक या आस्था की सत्ता को तेजी से भौतिक सत्ता की मुद्रा में परिवर्तित कर लेते हैं। ऐसे में तमाम धार्मिक संस्थानों या गुरुओं के पास  अकूत जमीन,  पैसा और बाहुबल इकट्ठा हो जाता है। ऐसे संस्थानों या गुरुओं पर इसीलिए अक्सर जमीन हड़पने,  पैसे का हेरफेर करने या बाहुबल द्वारा आतंक फैलाने के तमाम आरोप लगते रहते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं,  जब धर्म का राजसत्ता से टकराव हुआ,  मगर बड़े आध्यात्मिक नेताओं ने हमेशा राजसत्ता का प्रतिकार नैतिक सत्ता के आधार पर किया और अक्सर अपना बलिदान भी दिया है। लेकिन नए जमाने के धार्मिक नेता ताकत और पैसे के बल पर अपनी बात मनवाना चाहते हैं।

वे अपने अनुयायियों के वोटों के सहारे राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं,  इसलिए अक्सर राजनेता काफी संदिग्ध किस्म के धर्मगुरुओं के चरणों में बैठे नजर आते हैं। यह स्थिति न समाज के लिए अच्छी है,  और न धर्म के लिए। बंदूकों के सहारे न्यायपालिका की अवमानना करने की हिम्मत रामपाल और उनके समर्थकों की इसीलिए हुई,  क्योंकि वे राजनीति और प्रशासन की कमजोरी जानते हैं। कुछ हद तक यह मजबूरी भी है,  क्योंकि अगर अंधभक्त मरने-मारने पर उतारू हो जाएं, तो लोकतांत्रिक समाज में सरकार अनिर्बाध शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकती। जरूरी यह है कि धर्मगुरुओं और संस्थाओं की संपत्ति को कानून के दायरे में लाया जाए। वहां जो पैसे की अकूत बरसात होती रहती है,  उसकी जांच होनी चाहिए,  क्योंकि यह काले धन को पैदा करने और उसके लेन-देन का बड़ा जरिया है।

धर्म में हथियारों और बाहुबलियों की मौजूदगी को भी सख्ती से रोकना चाहिए। सबसे बड़ी जरूरत यह है कि धर्म और राजनीति के घालमेल को रोकने के लिए मुहिम चलाई जाए। हमारे समाज में जो यह धारणा है कि धर्म के नाम पर सब कुछ जायज है,  इस धारणा को तोड़ना जरूरी है,  वरना सड़कों को घेरकर लाउडस्पीकर बजाने वालों से लेकर किले जैसे आश्रमों में बैठकर गोलियां चलाने वालों की समानांतर सत्ताएं भारत गणराज्य के कानूनों को चुनौती देती रहेंगी।

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