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मंदी से बचने की नई उम्मीद

ऑस्ट्रेलियाई शहर ब्रिस्बेन में दुनिया के विकसित और सबसे तेजी से तरक्की कर रहे विकासशील देशों के नेताओं का जी-20 सम्मेलन संपन्न हो गया। जाहिर-सी बात है कि इस सम्मेलन पर दुनिया भर के देशों की निगाहें टिकी थीं, क्योंकि इसके फैसले वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए काफी अहमियत रखते हैं। मेरी नजर में इस सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि शिखर सम्मेलन में शामिल देशों के नेता 2.1 प्रतिशत की वैश्विक आर्थिक विकास दर का लक्ष्य हासिल करने के लिए ‘स्टिम्यूलस पॉलिसी’,  यानी आर्थिक पैकेज मुहैया कराने की प्रोत्साहन-नीति को जारी रखने पर सहमत हो गए हैं। इस सदर्भ में सभी देशों को जरूरी कदम उठाने को कहा गया है। जैसा कि केंद्रीय मंत्री सुरेश प्रभु ने भी कहा है,  मैं समझता हूं कि इससे भारत को लाभ होगा। इसके आर्थिक सुधारों को रफ्तार मिल सकती है।

स्टिम्यूलस पैकेज को लेकर कई विकसित देशों की घरेलू राजनीति गरम है। अमेरिका में राष्ट्रपति ओबामा से लगातार इस तरह की आर्थिक मदद को रोकने की मांग हो रही है,  बावजूद इसके जी-20 के नेताओं ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के हक में फैसला किया। जी-20 के इस फैसले को समझने के लिए हमें ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन की चिंताओं पर गौर करना होगा। डेविड कैमरन यूरोप की आर्थिक स्थिति को लेकर खासा चिंतित थे। यूरोजोन के आर्थिक हालात के प्रति दुनिया को आगाह करते हुए उन्होंने पहले भी कहा था कि यह क्षेत्र 2007-09 की मंदी से पूरी तरह से उबर नहीं पाया है और उसका काफी बुरा प्रभाव ब्रिटेन के निर्यात क्षेत्र पर पड़ा है। इस सिलसिले में कैमरन ने ब्राजील और रूस जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के कमजोर पड़ने की तरफ भी ध्यान दिलाया था। ऐसे में,  स्टिम्यूलस पैकेज की जरूरत समझी जा सकती है।

भारत ने इस मंच से काले धन का मुद्दा उठाया,  जिसे भरपूर महत्व मिला। वैसे तो यह मुद्दा पहले भी उठा है,  बल्कि विकसित देशों के फोरम और संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भी यह मुद्दा उठ चुका है। लेकिन बीच में यह ठंडा पड़ गया था। कई देशों के साथ द्विपक्षीय करार भी हुए थे। कई लोगों के नाम भी सामने आए,  लेकिन कुल मिलाकर यह प्रक्रिया इतनी उलझी हुई है कि भारत को इससे लाभ नहीं हुआ। अब नए सिरे से यह मसला अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठा है। भारत ने इसे जी-20 के मंच पर उठाया है और विकसित देशों ने भी इसे गंभीरता से लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मंच से बोलते हुए कहा कि सूचनाओं को साझा करने की किसी भी वैश्विक पहल का भारत स्वागत करेगा।

उन्होंने काले धन के मसले की गंभीरता को सामने रखते हुए साफ किया कि यह केवल कर चोरी का मसला नहीं है, बल्कि इसका रिश्ता मादक पदार्थों की तस्करी से है और आतंक फैलाने से भी। जी-20 के देशों का रुख इस बारे में काफी सकारात्मक है और ऐसा तंत्र विकसित करने के प्रति उन्होंने अपनी प्रतिबद्धता जताई है। भारत ने ‘मेकिंग इंडिया’ के जरिये पूर्ण व्यावसायिक पारदर्शिता की बात पहले ही सबके सामने रखी है। भारत में काला धन का मसला काफी समय से गरम रहा है। खासकर राजनीतिक क्षेत्र में इसे लेकर काफी तेज बहस होती रही है। ऐसे में,  अब जब दुनिया भर में इसे लेकर एक समान पहल होगी,  सभी तरह के आर्थिक कारोबार में पारदर्शिता बरती जाएगी,  तो आने वाले समय में इसका सुखद परिणाम भी देखने को मिलेगा।

जी-20 जैसी बैठकों में दुनिया के शीर्ष नेता आर्थिक चिंताओं पर तो सामूहिक रूप से विचार-विमर्श करते ही हैं,  वे राजनीतिक और सामरिक मसलों पर भी एक-दूसरे के साथ चर्चा करते हैं और इस रूप में भी यह सम्मेलन काफी महत्व रखता है। यूक्रेन का मसले पर तो कई देशों ने काफी मुखर होकर बोला। इसी तरह,  अमेरिकी फौजों की वापसी के बाद अफगानिस्तान के हालात, पश्चिम एशिया की स्थिति और आतंकवाद के मसले पर भी दुनिया के वरिष्ठ नेताओं ने आपस में बातचीत की।

इस सम्मेलन की एक खास बात यह रही कि इसमें एशिया-प्रशांत क्षेत्र फोकस में रहा। चूंकि इस क्षेत्र की व्यापारिक गतिविधियों को लेकर जो भी प्रयास होंगे,  उनमें भारत का महत्वपूर्ण योगदान रहने वाला है,  इसलिए भारत की तरफ सभी उत्सुकता से देख रहे थे। यह काफी अहम है कि यूरोप के नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जल्द-से-जल्द अपने देश में आने का न्यौता दिया,  बल्कि उनकी खुलकर प्रशंसा भी की। चीन की सक्रियता को देखते हुए एशिया-प्रशांत क्षेत्र पर अमेरिका की करीबी नजर है और इसीलिए ओबामा ने इस क्षेत्र के अपने सहयोगी देशों को  आश्वस्त करने के लिए ब्रिस्बेन के छात्रों के बीच कहा कि एशिया की सुरक्षा पारस्परिक समझौते के आधार पर होना चाहिए,  किसी धौंस-पट्टी के आधार पर नहीं।

इस बार के जी-20 सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन का मसला भी महत्वपूर्ण रूप से सामने आया और इबोला वायरस के खतरे जैसे मसले पर भी गंभीरता से चर्चा हुई। कुल मिलाकर,  हम कह सकते हैं कि इस शिखर बैठक के बाद दुनिया आश्वस्त हो सकती है कि मंदी जैसी स्थिति को रोकने के लिए विश्व अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने को लेकर तमाम विकसित व बड़े विकासशील देश गंभीर हैं और वे सभी जरूरी कदम उठाने जा रहे हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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