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मेरा यार बना है दूल्हा

बाराती बनना एक कला है। यह भारत की सबसे लोकप्रिय कला और उत्सव,  दोनों है। बाराती बनना सिखाया नहीं जाता,  व्यक्ति यह गुण नैसर्गिक रूप से साथ लेकर पैदा होता है। बाराती होने की कुछ अहर्ताएं होती हैं,  जो या तो जन्मजात होती हैं या फिर अनुभवी बारातियों से सीखी जा सकती हैं। घोड़ी के पीछे अपनी हैसियत और दमखम से बढ़कर नाचना बाराती बनने की एक अघोषित शर्त है। नागिन नाच नाचने वाले बाराती ऊंची किस्म के माने जाते हैं, बारात में इन्हें विशिष्ट दरजा प्राप्त होता है।

आजकल बारातियों के सिर पर साफे बांधकर उन्हें उच्च प्रजाति बाराती बनाने का चलन जोरों पर है। जिस मध्यवर्गीय बाबू के जीवन का सूरज टेबल पर पड़ी फाइलों में ही उदय और अस्त होता आया हो,  जो शख्स सब्जी मंडी में लौकी-कद्दू के भाव-ताव करने के लिए प्रसिद्धि के शिखर पर हो,  ऐसे व्यक्ति के सिर पर यदि गुलाबी रंग का साफा बांध दिया जाए,  तो सोचिए कि उसकी स्थिति क्या होगी? गुलाबी साफे का बोझ सम्हालने के लिए उसे अपने व्यक्तित्व से न जाने कितनी लड़ाई लड़नी पड़ती है। सदा कमान की तरह झुकी रहने वाली कमर इस साफे की अहमियत जानकर एकदम सीधी हो जाती है। सच्चा बाराती वह है,  जो बारात के दौरान ट्रैफिक कंट्रोल का कार्य भी पूरी निपुणता से करता हो। आदर्श बारात में बैंड,  फिर पीछे घोड़ी,  उस पर दूल्हा और उसके पीछे महिला और पुरुषों का इत्रमय हुजूम होता है। बारात का महत्वपूर्ण सदस्य पटाखों को दागने का कार्य करता है और हर थोड़े अंतराल पर अगरबत्ती की सहायता से पटाखे चला-चलाकर ध्यानाकर्षण प्रस्ताव लाता रहता है। कुछ बाराती सांकेतिक भाषा में भौंहे उचका-उचकाकर ‘व्यवस्था क्या है’ वाली बात कर लेते हैं। ऐसे लोग बारी-बारी से गायब होते रहते हैं। बारात जब लड़की के दरवाजे पर पहुंचती है,  तो उसका बाराती गुण अपने चरम पर पहुंच जाता है। वहां कल हो न हो वाले अंदाज से डांस होता है। इन नाचने वालों को डिनर टेबल पर धकेलकर लड़की का बाप यह जान लेता है कि बड़ी लड़ाई उसने जीत ली है। छोटी-मोटी लड़ाइयां तो फिर भी चलती रहती हैं।

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