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आज इतना ही

एक समय था,  जब ओशो प्रवचन के अंत में कहते- ‘आज इतना ही।’  उनका आशय था कि आज जितना कहना था, कह चुका। अब विराम। यह मन को निरंतर सावधान करने का मंत्र है। यह ऐसा मंत्र है,  जिसे आप कभी भी,  कहीं भी इस्तेमाल कर सकते हैं। जब भी मन बेहोश हो रहा हो,  तो खुद को झकझोरकर कहिए,  ‘आज इतना ही।’ जैसे भोजन को लीजिए,  स्वादिष्ट भोजन को देखकर सभी इंद्रियां एक सम्मोहित अवस्था में चली जाती हैं। मस्तिष्क के केंद्र से एक रस बहने लगता है,  जिसे डोपेमाइन कहते हैं। और उसके बाद हम लगभग बेहोशी की हालत में खाने लगते हैं। ज्यादा खा जाते हैं,  गलत चीजें खा जाते हैं। वही समय है कहने का,  ‘आज इतना ही।’ बस हाथ को रोक दीजिए और खाना बंद। यह आपके स्वास्थ्य का मंत्र बन जाएगा।

लेकिन इसका अभ्यास करना होगा। जैसे आप सड़क पर चले जा रहे हैं आदतवश,  ऐसे में अचानक पांवों से कहें,  ‘आज इतना ही।’ और पांव तत्काल रुक जाएंगे। किसी से झगड़ा हो रहा हो और बात लंबी फैलती जा रही हो,  तो कहें, ‘आज इतना ही’,  और देखिए,  आपकी उत्तेजित ऊर्जा को ब्रेक लगेगा। अनावश्यक मनमुटाव होने से बच जाएगा। अचानक आप होश में आएंगे। हर रात सोते समय आज के दिन का जायजा लें,  क्या आपने अपनी इच्छाओं को पूरी तरह जी लिया है? अपने अधूरे काम पूरे कर लिए?  ऐसा है,  तो ही आप कह सकते हैं, ‘आज इतना ही।’ लेकिन अफसोस,  हमारा दिन सूर्यास्त के साथ समाप्त नहीं होता। रात सोते समय अधूरे काम,  अधूरी बातें याद आती हैं। हम पूरे प्राणों से नहीं कह पाते,  ‘आज इतना ही।’ हर काम ऐसे करें,  जैसे यह आखिरी काम हो,  इसके बाद कोई जिंदगी नहीं बची है। हर पल के पूरे रस को निचोड़ लें,  तो ही आप रोज रात सोने से पहले कह सकेंगे- ‘आज इतना ही।’

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