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आधी आबादी का पिछड़ जाना

भारत में फैसले की प्रक्रिया में महिलाओं की स्थिति काफी बुरी है। ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स से पता चलता है कि 142 देशों की सूची में भारत 114वें स्थान पर है। महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने पर जोर देन की जरूरत है। किसी भी लोकतंत्र के सही संचालन के लिए सबसे जरूरी है सभी वर्गों और समूहों का संतुलित प्रतिनिधित्व। लेकिन दुनिया के कई बड़े लोकतांत्रिक देशों में महिलाओं की निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में हिस्सेदारी बहुत कम है। भारत में भी,  जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करता है,  महिलाओं की नियुक्ति निर्णय लेने वाले ऊंचे पदों पर कम ही होती है,  चाहे वह सरकारी क्षेत्र हो या निजी।

इसके पीछे के कारणों में सबसे ऊपर है रूढ़िवादी और पुरुष प्रधान सोच,  जो महिलाओं को आगे बढ़ने देना नहीं चाहती। और अगर महिलाएं तमाम बंधनों को लांघकर आगे बढ़ भी जाती हैं,  तो पितृ-सत्तामक सोच रखने वाले लोग महिलाओं के योगदान को नजरअंदाज कर प्रभावशील पदों पर आने ही नहीं देते और नीति-निर्धारण की प्रक्रिया से दूर रखते हैं। इसके अलावा शिक्षा की कमी एक बहुत बड़ा कारण है। देश के कई हिस्सों में लड़कियों की स्कूली शिक्षा पूरी ही नहीं हो पाती,  उच्च शिक्षा तो दूर की बात है। तीसरा,  महिलाओं पर घर की जिम्मेदारियों का इतना भार लाद दिया जाता है कि वे कुछ और करने या आत्मनिर्भर होने का सोच ही न पाएं। ऐसे में,  निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी न होना और जेंडर गैप बढ़ना स्वाभाविक बात है।
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