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मोदी के मुरीद

नरेंद्र मोदी जिस भी देश की यात्रा करते हैं,  वहां उनके स्वागत में काफी भीड़ इकट्ठा होती है और बड़े जश्न का माहौल होता है। जाहिर है,  इन लोगों में ज्यादातर आप्रवासी भारतीय ही होते हैं,  लेकिन आप्रवासी भारतीयों में ऐसा उत्साह शायद ही किसी प्रधानमंत्री के लिए देखने में आया होगा। इसकी एक वजह तो यह है कि पिछले सालों में दुनिया के कई बड़े देशों में आप्रवासी भारतीय समूह राजनीतिक और आर्थिक रूप से काफी रसूखदार हो गए हैं। भारत के प्रधानमंत्री का इस तरह स्वागत करना,  उस देश में उन्हें अपने प्रभाव को दिखाने का एक जरिया बन जाता है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह में कई गुण थे,  लेकिन जन-संपर्क और सार्वजनिक वक्तृता उन गुणों में नहीं थे। उनमें भीड़ को संबोधित करके उसे प्रभावित करने का हुनर नहीं था। वह जब विदेशी दौरों पर या अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में जाते थे,  तो काम से काम रखते थे। इसके बरक्स मोदी सार्वजनिक कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करते हैं और भीड़ को मंत्रमुग्ध करना उन्हें आता है।

दूसरी वजह यह भी है कि मोदी उस तरह के प्रधानमंत्री हैं,  जो आप्रवासी भारतीयों की पसंद बन सकते हैं। जो लोग भारत से विकसित देशों में गए हैं,  उन्हें यह एहसास है कि वे एक विकासशील देश से बेहतर जिंदगी की तलाश में अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया आए हैं। भारत की गरीबी,  बदहाली,  भ्रष्टाचार और सार्वजनिक सेवाओं का खराब स्तर उन्हें चुभता तो है ही,  उन्हें यह भी लगता है कि काश,  उनका देश भी विकसित देशों जैसा हो सकता। मोदी ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जो देश को विकसित देशों के स्तर तक  ले जाने की बात करते हैं। उनकी महत्वाकांक्षा और उम्मीदें बड़ी हैं। मोदी भ्रष्टाचार और काला धन खत्म करने की बात करते हैं। वह ‘मेक इन इंडिया’ का नारा देते हैं। वह सरकारी तंत्र को चुस्त-दुरुस्त करने और सार्वजनिक सेवाओं को विश्व स्तर का बनाने की बात करते हैं।

इस सदी के पहले दशक में जब तेज आर्थिक विकास हुआ,  तो भारत की अहमियत दुनिया में बढ़ी और भारतीयों की आकांक्षाएं भी ज्यादा बड़ी हुईं। यह उम्मीद जगी कि भारत अपने पिछड़ेपन से बाहर आकर बड़ी विश्व शक्ति बनने की राह पर है। आईटी और संचार क्रांति ने इन उम्मीदों को पंख लगा दिए। सन 2008-09 में जो वैश्विक आर्थिक मंदी आई,  उसके बाद विकास की रफ्तार धीमी हो गई,  लेकिन भारतीयों की उम्मीदों को पंख तो लग चुके थे। यह जो मोहभंग हुआ,  उसका नतीजा सन 2014 के चुनावों में देखा जा सकता है। मोदी इस चुनाव में इसलिए कामयाब हुए कि उन्होंने लोगों को यकीन दिलाया कि वह उनकी उम्मीदें पूरी करेंगे। भारत की तरक्की से आप्रवासी भारतीयों में भी आत्मविश्वास आया था,  जिसे पिछले चार-पांच साल में काफी चोट पहुंची है।

नरेंद्र मोदी फिर से उम्मीदों की भाषा लेकर उनके बीच पहुंचे हैं और अब अनिवासी भारतीयों को यह लग रहा है कि नए प्रधानमंत्री देश के विकास को पटरी पर ला सकते हैं। आप्रवासी भारतीयों में अपने देश,  अपनी संस्कृति,  अपने धर्म के प्रति आकर्षण कुछ ज्यादा ही होता है। भौतिक दूरी इस अतिरिक्त आकर्षण की मुख्य वजह है। इसी वजह से आप्रवासियों में भाजपा और विश्व हिंदू परिषद जैसे संघ परिवार के संगठनों के प्रति ज्यादा समर्थन है। संघ परिवार का संगठन ज्यादा व्यवस्थित और कामकाज ज्यादा अनुशासित है। इसलिए इस समर्थन को बढ़ाने के लिए वे सक्रिय हैं। ‘फ्रेंड्स ऑफ बीजेपी’ जैसी संस्थाएं विदेशों में काफी वक्त से सक्रिय हैं। लंबे वक्त बाद उन्हें अपने विचारों के अनुकूल प्रधानमंत्री मिला है। इन संगठनों का उत्साह और आयोजन कौशल भी इन आयोजनों में देखा जा सकता है।

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