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दोस्ती का नया दौर

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधिकारिक ऑस्ट्रेलिया दौरे के राजनीतिक-आर्थिक और रणनीतिक महत्व हैं। 1986 के बाद से कोई भारतीय प्रधानमंत्री ऑस्ट्रेलिया नहीं आया। 1986 में ऑस्ट्रेलिया-सरकार की बागडोर बॉब हॉक के हाथों में थी,  जबकि भारत में तब राजीव गांधी प्रधानमंत्री हुआ करते थे। नरेंद्र मोदी के दौरे का मुख्य आकर्षण पार्लियामेंट में उनका भाषण होगा। एक हिंदू राष्ट्रवादी और परंपरावादी राजनीतिज्ञ मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर बेहतर आर्थिक प्रबंधक की छवि अर्जित की है। ऐसे में, उनका प्रधानमंत्री बनना दोनों देशों के आपसी संबंधों को मजबूत बनाने का एक बेहतर मौका है। सितंबर महीने में अपने भारत दौरे के दौरान प्रधानमंत्री टोनी एबट ने भारत को यूरेनियम बेचने पर लगे प्रतिबंध को हटाने की घोषणा की थी,  और इससे दोनों देशों के रिश्तों को नया मोड़ देने का माहौल तैयार हुआ।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत को पूरी दुनिया में एक ‘महत्वपूर्ण वैश्विक ताकत’ के रूप में देखा जा रहा है। खासकर एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते वर्चस्व को उसकी चुनौती के लिहाज से। इसीलिए नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग,  दोनों ऑस्ट्रेलिया के दौरे के बाद फिजी जा रहे हैं। यह गौर करने वाली बात है कि फिजी में भारतीय मूल के लोगों की विशाल आबादी है,  इसके बावजूद सन 1981 के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने सूवा का दौरा नहीं किया। भारत के साथ ऑस्ट्रेलिया का द्विपक्षीय रिश्ता लंबे समय से आधा-अधूरा पड़ा रहा। इन दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय कारोबार सालाना 15 बिलियन डॉलर का होता है,  जो कि बहुत ही कम है,  खासकर चीन के मुकाबले,  जिसके साथ ऑस्ट्रेलिया साल में 150 बिलियन डॉलर का दोतरफा व्यापार करता है। जाहिर है,  नरेंद्र मोदी के दौरे से ऑस्ट्रेलियाई कारोबारियों के लिए हिन्दुस्तान में नए दरवाजे खुलेंगे।.. एक लंबे समय तक भारत का नेतृत्व कमजोर हाथों में संरक्षित रहा। अब नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने से दोनों मुल्कों के बीच आर्थिक,  सैन्य और रणनीतिक साझेदारी की नई उम्मीदें पैदा हुई हैं।
द ऑस्ट्रेलियन, ऑस्ट्रेलिया

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