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आत्मा ही वास्तविक तीर्थ

ज्ञान एक तर्कसंगत अभिव्यक्ति है। प्रत्येक अवस्था में कारण और प्रभाव तत्व उपस्थित रहता है। जब हम कोई भी काम विवेक के अनुसार तर्क के आधार पर करते हैं,  उसी समय हम कारण और प्रभाव तत्व की ओर भी आकर्षित होते हैं। तब वह विज्ञान कहलाता है। इस दुनिया में सभी कुछ कारण के दायरे के अंदर आता है और कोई भी चीज अकारण नहीं है। हम देख कर पता लगा सकते हैं कि कारण तत्व क्या है?  उदाहरण के लिए हम चीनी को लेते हैं। चीनी का कारण तत्व क्या है?  चीनी का कारण तत्व गन्ना है। अब जहां गन्ना कारण तत्व है तो चीनी वहां प्रभाव तत्व है। जब यहां गन्ना प्रभाव तत्व है तो बीज कारण तत्व है। इसीलिए जीवन के हरेक क्षेत्र में कारण तत्व है। विज्ञान क्या है?  जो विवेकशीलता पर आधारित हो और कारण व प्रभाव तत्व पर भी ध्यान रखता हो,  वह विज्ञान कहलाता है। कई सौ वर्ष पूर्व एक महान दार्शनिक महर्षि कणाद ने कहा था- ‘कारणाभावात् कार्याभाव:’ यानी जहां कारण तत्व नहीं है, वहां प्रभाव तत्व नहीं हो सकता।

आध्यात्मिक साधना का अभ्यास भी विज्ञान के दायरे में आता है। सर्वप्रथम भगवान सदाशिव ने आध्यात्मिक विज्ञान की खोज की थी। सभी प्राणियों में कमोबेश ज्ञान होता है,  किंतु अंर्तज्ञान का अभाव होता है। मनुष्य में ज्ञान और अंर्तज्ञान दोनों तत्व रहते हैं। मनुष्य एक अजीब प्रकृति का जीव है,  उसके मस्तिष्क के कुछ भागों में चेतन और कुछ भागों में अचेतन अवस्था है। वहीं पर सारी क्षमताएं उपस्थित हैं। एक बार भगवती पार्वती ने भगवान सदाशिव से प्रश्न पूछा- कोई कैसे जान और अनुभव कर सकता है कि भक्ति एकमात्र पथ है?  जब कोई भक्ति को विकसित करने के लिए अपनी सभी संभव क्षमताओं को परमपुरुष में समर्पित कर देता है,  तब यही समर्पित भक्ति मनुष्य को भक्त बनाती है और इसी अवस्था को भक्ति कहा जाता है। अब भगवान सदाशिव कहते हैं- आत्म बोध क्या है? जब मन की चेतना बाहरी जगत से निकल कर आंतरिक जगत में परिवर्तित हो जाती है,  वही वास्तव ज्ञान है। यहां बाहरी ज्ञान का कोई स्थान नहीं है।

विज्ञान के छात्रों को पता है कि छाया के दो भाग हैं- छाया और छाया की प्रतिच्छाया, जो वास्तविक ज्ञान नहीं है। यहां शिवजी कहते हैं- न तो छाया और न ही उसकी प्रतिच्छाया वास्तविक ज्ञान है। वे कहते हैं- सभी बाह्य ज्ञान (जहां ज्ञान का अर्थ है- बाहरी वस्तु के अनुभव को अपने अंदर स्थित करना) वास्तव में ज्ञान नहीं है। छाया और प्रतिच्छाया की ओर देखने से वास्तविक चीज का उचित ज्ञान नहीं हो सकता,  जैसे- एक अमरूद का पेड़ है और एक लीची का पेड़ है। दोनों पेड़ों की छाया और प्रतिच्छाया देखने से पता नहीं चलता कि कौन अमरूद का पेड़ है और कौन लीची का। यही भगवान सदाशिव का जवाब था,  जिन्होंने आध्यात्मिक विज्ञान का आविष्कार किया था।

पार्वती द्वारा शिवजी से प्रश्न पूछा गया था- हे ईश्वर! समाज में बहुत से ऐसे लोग हैं, जो कहते हैं कि यह पवित्र स्थल है, वह अपवित्र स्थल है। वे लोग विश्व भर में तीर्थस्थल के लिए इधर-उधर घूमते हैं। तो सही पथ क्या होना चाहिए? उत्तर मिलता है- इस अभिव्यक्त सृष्टि के अंदर परम चैतन्य सत्ता छिपी हुई है,  इसलिए आत्मा यानी अपने को जानना ही सबसे अच्छा तीर्थ है। आत्मा सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है,  बल्कि आत्मा ही केवल तीर्थ है। तुम सभी आध्यात्मिकों को यह भी जानना चाहिए कि तुम्हारी गति सूक्ष्म से स्थूल की ओर नहीं,  बल्कि स्थूल से सूक्ष्म की ओर है। तुम इस स्थूल जगत की उपेक्षा नहीं कर सकते,  क्योंकि तुम्हारे अस्तित्व का भरण-पोषण इसी स्थूल जगत में हुआ है। इसलिए तुम्हें स्थूल जगत का भी वैसे ही सम्मान करना है,  जैसा कि सूक्ष्म जगत का।
प्रस्तुति: आचार्य दिव्यचेतनानन्द

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