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नेहरू के विचारों पर खतरा पैदा हो गया है: सोनिया

नेहरू के विचारों पर खतरा पैदा हो गया है: सोनिया

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की विरासत को दृढ़तापूर्वक सामने रखने का प्रयास करते हुए और भाजपा पर हमला करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने आज कहा कि उनके (नेहरू के) विचारों पर खतरा पैदा हो गया है, क्योंकि तथ्यों को गलत ढंग से रखा जा रहा है और तोड़ मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता की अकाट्य जरूरत पर भी जोर दिया।

जवाहरलाल नेहरू की 125वीं जयंती पर कांग्रेस द्वारा आज आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी, मार्क्‍सवादी कम्युनिसट पार्टी के प्रकाश करात और सीताराम येचुरी, जनता दल सेक्युलर के नेता एवं पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा, जनता दल यूनाइटेड के शरद यादव, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के डी राजा और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के डी पी त्रिपाठी ने हिस्सा लिया। हालांकि इसमें सपा, बसपा, द्रमुक, नेशनल कांफ्रेंस और तेदेपा के प्रतिनिधि उपस्थित नहीं थे। राष्ट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद हालांकि उपस्थित नहीं थे, लेकिन उनकी पार्टी के सांसद जयप्रकाश नारायण यादव सम्मेलन में मौजूद थे।

कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने प्रारंभिक भाषण में कहा कि नेहरु के जीवन और कार्यों के बारे में जानकारी का प्रवाह हाल के दिनों में तथ्यों को गलत ढंग से रखने और तोड़ मरोड़ कर पेश करने से कमजोर हुआ है। उन्होंने कहा कि देश के पहले प्रधानमंत्री के लिए धर्मनिरपेक्षता और सभी धर्मों के प्रति आदर आस्था का सवाल था। सोनिया ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता के बिना कोई भारतीयता, कोई भारत नहीं हो सकता, धर्मनिरेपक्षता आदर्श से भी बढ़कर है और रहेगी, भारत जैसे विविधतापूर्ण देश के लिए यह एक अकाट्य जरूरत है।

सोनिया ने कहा कि नेहरू का यह मत बिल्कुल सही साबित हुआ है कि बहु जातीय, बहु धार्मिक, बहु भाषाई और बहु क्षेत्रीय समाज में सिर्फ संसदीय लोकतंत्र और एक धर्मनिरपेक्ष सरकार ही देश को एकजुट रख सकती है।

लोकसभा चुनावों में करारी हार के छह महीने बाद कांग्रेस द्वारा इस तरह का यह पहला आयोजन है। पार्टी के इस आयोजन को सभी गैर भाजपा और गैर राजग दलों को धर्मनरपेक्षता की छतरी तले एकजुट करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।

परमाणु करार के मुद्दे को लेकर वाम दलों ने 2008 में संप्रग एक सरकार से समर्थन वापस ले लिया था, जबकि तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी ने 2012 में संप्रग दो सरकार से नाता तोड़ा था। इसके बाद से कांग्रेस का यह ऐसा पहला आयोजन है जिसमें ममता बनर्जी और वाम दलों के नेता हिस्सा ले रहे हैं।

इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या भाजपा के किसी अन्य नेता को आमंत्रित नहीं किया गया है। सोनिया ने कहा कि यह सम्मेलन सिर्फ पंडित नेहरू की 125वीं जयंती मनाने भर का नहीं बल्कि नेहरू की विरासत की प्रासंगिकता, स्थायित्व और अपरिहार्यता की पुष्टि करने का एक अवसर है। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह सम्मेलन उस उद्देश्य की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान करेगा।

ऐसे समय में जब कांग्रेस लोकसभा चुनाव और उसके बाद विधानसभा चुनाव में सबसे बुरी पराजय से उबरने की कोशिश कर रही है, तब सोनिया गांधी ने नेहरू का हवाला देते हुए कहा कि लोकतंत्र में, हम जीत और हार को गरिमा से स्वीकार करना जानते हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि जो लोग जीते हैं, उन्हें जीत को सिर पर हावी नहीं होने देना चाहिए। जो लोग हारे हैं, उन्हें निरुत्साहित नहीं महसूस करना चाहिए। जीतने और हारने का तरीका चुनाव परिणाम से अधिक महत्वपूर्ण है। गलत तरीके से जीतने से बेहतर सही तरीके से हारना है।

समारोह के दौरान देश के प्रथम प्रधानमंत्री की विरासत और दुनिया के बारे में उनके विचारों को रेखांकित किया गया जिसमें अतंरराष्ट्रीय नेताओं और भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।

समारोह में अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई, घाना के जान कुफूर, नाइजीरिया के जनरल ओबासांजो, नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री माधव नेपाल, भूटान की रानी मां दोरजी बांग्मो वांगचुक, पाकिस्तान की मानवाधिकार कार्यकर्ता अस्मा जहांगीर, दक्षिण अफ्रीका के वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी अहमद काथराडा और दुनिया भर से 11 राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।

समारोह में दो विषयों समावेशी लोकतंत्र एवं लोक सशक्तिकरण और दुनिया के बारे में नेहरू के विचार तथा 21वीं सदी में लोकतांत्रिक वैश्विक व्यवस्था पर चर्चा हो रही है।

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