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जमीन से जुड़े हुए लोगों के प्रकार

जमीन से जुड़ना आसान नहीं है। देश की भूख मिटाने वालों के लिए खुद हवा-पानी पर तो जिंदा रहना कठिन है,  उस पर महंगे बीज, खाद और कीटनाशक की कीमतों के उधार का कहर! कुदरत भी कमजोरों को नहीं बख्शती। बाढ़ में वही बहते हैं,  तो सूखे में उनके ही खेत सूखते हैं। 21वीं सदी में आसमान ताककर यदि किसी का भविष्य निर्धारित होता है, तो वह इस देश का किसान है, बाकी खुशकिस्मत हैं। जमीनी लोगों की एक अन्य श्रेणी बिल्डर की है। कुछ कमअक्ल इन्हें भू-माफिया भी कहते हैं। ये खेत-खलिहान, सरकारी भूखंड, ताल-तलैया, पार्क, कब्रिस्तान किसी को भी हथियाने में समर्थ हैं। कभी-कभी तो ये हथेली में इमारत उगाकर व बेचकर भी दिखाते हैं। हमारे मुल्क में चमत्कार लोकप्रिय है। कई बाबाओं के भभूत वितरण केंद्र कार्यरत हैं। इस सहज विश्वासी प्रवृत्ति का बिल्डर क्यों न फायदा उठाएं? उनका कथित मिशन हर सिर को छत देने का है।

हिन्दुस्तान में सही सोर्स हो,  तो हत्या,  घूस-भ्रष्टाचार,  निर्धनता,  चुनाव की हार,  व्यभिचार हर किसी का नैसर्गिक अधिकार है। देश के निर्माता यानी बिल्डर बंधुओं की इस कला में कोई सानी नहीं है। उनके व्यक्तित्व में मुगलिया सल्तनत की शानो-शौकत,  बीरबल की हाजिर-जवाबी और संपर्क-संगीत में तानसेन जैसी रियाज व महारत का खुशनुमा एवं नायाब मिश्रण है। उनके जाल में न जाने कितने अफसर व सियासी सत्ताधारियों के बेटे, दामाद आदि फंसकर अपने घर बैठे पधारी दौलत पर इठला रहे हैं। बस कहीं लैंड यूज,  तो कभी नक्शा बदलवाना पड़ा है। ऐसे महापुरुषों के मुखारबिंदु से सिफारिश नहीं,  सिर्फ उसूल झरते हैं। ये दोमुखी प्रजाति हैं। सिफारिश-पैरवी आदि के लिए इनका यकीन व्यक्तिगत सहायक और सचिव वगैरह के मुंह का इस्तेमाल है। हमारे अनूठे पारिवारिक प्रजातंत्र के पूर्व कुछ नाकारा किस्म के नेताओं ने जनता से जुड़ने जैसी हिमाकत की थी। इन्हें भी जमीनी नेता कहा जाता है। सत्ता के लुभावने गलियारों में ऐसे-ऐसों को अचानक ज्ञान का दौरा पड़ता है। उन्होंने भिनकती जनता के बीच रह क्या-क्या नहीं गंवाया? अब वे जमीन से जुड़कर चैन की सीटी बजा रहे हैं।

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